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मेरा नटखट नन्हा कान्हा - ३ - वैदिक सागर

मेरा नटखट नन्हा कान्हा  फाल्‍गुन कृष्‍ण त्रयोदशी तिथि थी। सायंकाल चतुर्दशी हो जाने से महाशिवरात्रि का दिन था। अरुणोदय प्रारम्‍भ ही हुआ था कि कंस ने दूत भेजकर पीठ, पैदिक, असिलोम आदि मन्‍त्रियों को बुलवाया। उसने आज्ञा देनी प्रारम्‍भ की– ‘रंगशाला को फिर से सजा दिया जाय। माल्‍य, किसलय-तोरणादि शीघ्र लगाये जायें। सुगन्‍धित धूप जलायी जाये वहाँ चारों ओर। मल्‍लक्रीड़ा महोत्‍सव की घोषणा करो। राजकीय वाद्य-वादकगण अविलम्‍ब वहाँ वादन प्रारम्‍भ करें। थोड़े ही क्षणों में रंगशाला से सुमधुर वाद्यों की ध्‍वनि आने लगी। धनुष टूट चुका था, सत्‍यक जी नगर में नहीं थे। अत: धनुर्यज्ञ अथवा माहेश्वर महामख की चर्चा व्‍यर्थ थी। कंस ने नगर में मल्‍लक्रीड़ा महोत्‍सव की घोषणा करवा दी प्रात:काल। ‘देवकी-वसुदेव को तथा उग्रसेन को भी कारागार से ले आओ।’ कंस ने आदेश दिया– ‘ये सुरक्षित मंचों पर पृथक-पृथक बैठाये जावेंगे। नगर में घोषणा करो कि समस्‍त नागरिकों को महाराज मल्‍लक्रीड़ा देखने को आमन्‍त्रित करते हैं। सबको अवश्‍य आना चाहिये। कोई गृहों में न रहे। भवनों की नगर की रक्षाकी व्‍यवस्‍था की गयी है। यह कार्य राजपुरु...

मेरा नटखट नन्हा कान्हा - 2- वैदिक सागर

मेरा नटखट नन्हा कान्हा  ‘धनुष टूट गया'  इस समाचार ने सबसे बड़ा धक्‍का दिया और उस पर जो सेना भेजी गयी, सेनापति सहित वह पूरी सेना दो बालकों ने मार दी। एक भी कोई उनमें से संहार का समाचार देने कंस तक नहीं लौटा। सत्‍यक भी भीरु ही निकला। अन्‍तत: है तो वह भी ब्राह्मण ही। कंस मुट्ठियां बांधकर इधर-से-उधर कक्ष में घूमने लगा। अन्धकार हो चला। कक्ष में सेवक ने प्रदीप जला दिये। कंस सहसा चौंका– ‘उसकी छाया में ये इतने छिद्र छाया के तो मस्‍तक ही नहीं है।’ घबराकर सिर टटोला उसने– ‘सिर तो अपने स्‍थान पर ही है।’ बाहर आ गया कक्ष से वह किन्‍तु आज उसके नेत्रों को क्‍या हो गया है? उसे सब तारे दो-दो दीखते हैं। वृक्षों के पत्ते ऐसे स्‍वर्णिम लगते हैं, जैसे वृक्षों में आग लगी हो। वह फिर कक्ष में आया और फिर चौंका– ‘उसकी छाया पर दो सिर कैसे?’ फिर अपना सिर टटोला उसने। ‘ये बहुत बुरे अपशकुन हैं।’ कंस को अब स्‍मरण आया। उसने कान बन्‍द करके भीतर होने वाला शब्‍द सुनने का प्रयत्‍न किया किन्‍तु बहुत प्रयत्‍न करके भी प्राण-घोष सुनायी नहीं पड़ा। उसने नासिकाग्र और भ्रू देखना चाहा। इनमें से एक की तनिक सी भी झ...

मय्यावेश्य मनो ये मां नित्ययुक्ता उपासते - गीता सार - वैदिक सागर

अर्ज़न ने कहा, इस प्रकार जो भक्त निरंतर योगयुक्त होकर आपको आराधते है ,और जो आपके अविनाशी,अव्यक्त, स्वरुप की आराधना करते है उनमें से योग के उतम ज्ञाता कौन है ? " मय्यावेश्य मनो ये मां नित्ययुक्ता उपासते      श्रद्धया परयोपेतास्ते मे युक्तमा  मता:  "       ------------------------------ भगवान ने कहा, जो मुझ में मन को लगा कर निरंतर युक्त हुए , मुझ को आराधते है और परम श्रद्धा सहित है वे मुझ में अत्यंत मिले हुए माने गए है ! इंद्रियों के समूह को संयम में कर के आराधते है , वे भी सब भूतों के हित में तत्पर जन मुझ को ही प्राप्त होते है ! उन अव्यक्त में चित लगाने वाले उपासकों को अधिक क्लेश होता है-क्योंकि उसकी धारणा करना कठिन काम है ! निश्चय से अव्यक्त गति को देहधारी दु:ख से ही प्राप्त कर सकते है !       परंतु जो जन सब कर्म मुझ में समर्पण करके , मुझ में परायण होकर ,अनन्य भक्तियोग से ही ध्यान करते हुए मुझ को आराधते है ! उन मुझ में चित लगाए हुए जनों का , मृत्यु के संसार सागर से ? हे पार्थ ! मै तुरंत उद्धार कर देता हूँ ! इस कार...

सहजं कर्म कौन्तेय सदोषमपि न त्यजेत् - गीता श्लोक - वैदिक सागर

सहजं कर्म कौन्तेय सदोषमपि न  त्यजेत् |  सर्वारम्भा हि दोषेण धूमेनाग्निरिवावृताः || ४८ || सहजम् – एकसाथ उत्पन्न; कर्म – कर्म; कौन्तेय – हे कुन्तीपुत्र; स-दोषम् – दोषयुक्त; अपि – यद्यपि; न – कभी नहीं; त्यजेत् – त्यागना चाहिए; सर्व-आरम्भाः – सारे उद्योग; हि – निश्चय ही; दोषेण – दोष से; धूमेन – धुएँ से; अग्निः – अग्नि; इव – सदृश; आवृताः – ढके हुए | प्रत्येक उद्योग (प्रयास) किसी न किसी दोष से आवृत होता है, जिस प्रकार अग्नि धुएँ से आवृत रहती है | अतएव हे कुन्तीपुत्र! मनुष्य को चाहिए कि स्वभाव से उत्पन्न कर्म को, भले ही वह दोषपूर्ण क्यों न हो, कभी त्यागे नहीं | तात्पर्य : बद्ध जीवन में सारा कर्म भौतिक गुणों से दूषित रहता है | यहाँ तक कि ब्राह्मण तक को ऐसे यज्ञ करने पड़ते हैं, जिनमें पशुहत्या अनिवार्य है | इसी प्रकार क्षत्रिय चाहे कितना ही पवित्र क्यों न हो, उसे शत्रुओं से युद्ध करना पड़ता है | वह इससे बच नहीं सकता | इसी प्रकार एक व्यापारी को चाहे वह कितना ही पवित्र क्यों न हो, अपने व्यापार में बने रहने के लिए कभी-कभी लाभ को छिपाना पड़ता है, या कभी-कभी कालाबाजार चलाना पड़ता...

विद्याविनयसम्पन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि - गीता श्लोक - वैदिक सागर

विद्याविनयसम्पन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि । शुनि चैव श्वपाके च पण्डिता: समदर्शिन: ॥१८॥ ज्ञानी महापुरुष विद्या-विनययुक्त ब्राह्मण में और चाण्डाल में तथा गाय, हाथी एवं कुत्ते में भी समरूप परमात्मा को देखनेवाले होते हैं। व्याख्या-  बेसमझ लोगों के द्वारा यह श्लोक प्रायः सम-व्यवहार के उदाहरण रूप में प्रस्तुत किया जाता है। परन्तु इस श्लोक में ‘समवर्तिनः’ न कह कर ‘समदर्शिनः’ कहा गया है, जिसका अर्थ है- समदृष्टि, न कि सम-व्यवहार। यदि स्थूलदृष्टि से भी देखें तो ब्राह्मण , चाण्डाल, गाय , हाथी और कुत्ते के प्रति सम-व्यवहार असम्भव है। इनमें विषमता अनिवार्य है। जैसे, पूजन विद्या-विनययुक्त ब्राह्मण का ही हो सकता है, न कि चाण्डाल का; दूध गाय का ही पीया जाता है, न कि कुतिया का; सवारी हाथी पर ही की जा सकती है, न कि कुत्ते पर। जैसे शरीर के प्रत्येक अंग के व्यवहार में विषमता अनिवार्य है, पर सुख-दुःख में समता होती है अर्थात् शरीर के किसी भी अंग का सुख हमारा सुख होता है और दुःख हमारा दुःख। हमें किसी भी अंग की पीड़ा सह्य नहीं होती। ऐसे ही प्राणियों से विषम (यथायोग्य) व्यवहार करते हुए भी उनके सु...

गोपीगीतम् – 18 - वैदिक सागर

गोपीगीतम् – 18 ---------------------- व्रजवनोकसां व्यक्तिरङ्ग ते,  वृजिनहन्त्र्यलं विश्वमङ्गलम्।  त्यज मनाक् च नस्त्वत्स्पृहात्मनां,  स्वजनहृद्रुजां यन्निषूदनम्।। "हे प्यारे श्यामसुन्दर ! तुम्हारी यह अभिव्यक्ति व्रज-वनवासियों के सम्पूर्ण दुःख-ताप को नष्ट करने वाली और विश्व का पूर्ण मंगल करने के लिए है । हमारा हृदय तुम्हारे प्रति लालसा से भर रहा है । कुछ थोड़ी सी ऐसी औषधि प्रदान करो, जो तुम्हारे निज जनो के हृदय-रोग को सर्वथा निर्मूल कर दे।" भावार्थ --------- हे श्यामसुन्दर! आपका यह प्राकट्य सम्पूर्ण व्रजवासी एवं वनवासी जनों के सब प्रकार के पापों का हनन करने वाला है; साथ ही, विश्व का पूर्ण मंगल करने वाला है। हमारा हृदय आपके सम्मिलन की लालसा से भरपूर है। हे मदन मोेहन! आप प्रकट होकर स्वजनों के हृदय-रोग को उपशमन करने वाली औषध हमको दें। सदा-सर्वदा सर्वव्याप्त परात्पर परब्रह्म प्रभु की प्रकट, अप्रकट एवं प्रकटा-प्रकट ये तीन प्रकार की लीलाएँ होती हैं। अप्रकट लीला चक्षु-गोचर नहीं होती-प्रकट लीला का प्रत्यक्ष अनुभव देवता एवं मानवों को होता है। प्रकटाप्रकट वह लीला है, ...

श्रद्धा और विश्वास क्या है? - वैदिक सागर

श्रद्धा और विश्वास क्या है??? भवानीशंकरौ वन्दे श्रद्धाविश्वासरूपिणौ। याभ्यां विना न पश्यन्ति सिद्धाः स्वान्तःस्थमीश्वरम्‌॥ भावार्थ:-  श्रद्धा और विश्वास के स्वरूप श्री पार्वतीजी और श्री शंकरजी की मैं वंदना करता हूँ, जिनके बिना सिद्धजन अपने अन्तःकरण में स्थित ईश्वर को नहीं देख सकते॥ यह श्रीरामचरितमानस के शुरू में ही श्री तुलसीदास जी ने लिखा है| आओ इस को समझने का प्रयास करें। एक जीव के मन  में अनेको प्रकार के भाव उठते रहते हैं, कभी श्रद्धा का, कभी विश्वास का, कभी दया का, कभी क्रोध का, कभी परोपकार का, कभी अहंकार का, कभी काम का, कभी मोह का, कभी लोभ इत्यादि का। हर जीव इन अनेको भावो को महसूस करता है इसी कारण इसको विस्तार नहीं देते। यह सब भाव हर जीव केवल महसूस कर सकता है। अगर हम जीव को किसी भी भाव को परिभाषित करने को कहें तो यह उस जीव के लिए अति कठिन कार्य होगा। चूँकि यह भाव हर जीव में उठते है तो दूसरा जीव इन भावो के नाम लेते ही इसे महसूस करके इस जीव की बात को समझ तो जाता है परन्तु वह भी इसे व्यक्त नहीं कर पाता। मुझे श्री राम भगवान् में विश्वास है यह सब कहते हैं पर...

नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन - गीता शलोक - वैदिक सागर

नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया  न बहुना श्रुतेन।  यमेवैष वृणुते तेन लभ्यस्वतस्यैष आत्मा विवृणुते तनूं स्वाम्।। "यह आत्मा न प्रवचन से,न बुद्धि से ,न बहुत सुनने से प्राप्त (साक्षात्कार) होता है । यह आत्मा उसको प्राप्त होता है ,जो इसका वरण करता है । उसे यह आत्मा अपना यथार्थ स्वरूप प्रकट कर देता है ।" भावार्थ --------- यहां आत्मा को पाने का अर्थ है – आत्मा के वास्तविक स्वरूप का ज्ञान प्राप्त करना । धार्मिक गुरुओं के प्रवचन सुनने से, शास्त्रों के विद्वत्तापूर्ण अध्ययन से, अथवा ढेर सारे शास्त्रीय वचनों को सुनने से यह ज्ञान नहीं मिल सकता है । इस ज्ञान का अधिकारी वह है जो मात्र उसे पाने की आकांक्षा रखता है । आत्मसाक्षात्कार के लिए प्यास चाहिए ,मुमुक्षा चाहिए । आत्मसाक्षात्कार बुद्धि का विषय नहीं है ,इसे बुद्धि से नहीं पा सकते हैं। प्रवचन आदि सुनने -सुनाने से ,आत्मसाक्षात्कार नहीं होता है । आप रोज कोई ग्रन्थ का स्वाध्याय करें , या सत्संग करें इससे आत्मज्ञान नहीं होगा । आत्मज्ञान के लिए मुमुक्षा ,प्यास चाहिए । आत्मा जब  आत्मा को वरण करता है , तभी  आत्मस...

तेषां के योगवित्तमा: - गीता शलोक - वैदिक सागर

तेषां के योगवित्तमा:  ------------------------ अर्जुन उवाच– एवं सततयुक्ता ये भक्तास्त्वां पर्युपासते । ये चाप्यक्षरमव्यक्तं तेषां के योगवित्तमा: ।।          –श्रीमद्भगवद्गीता 12/1 "अर्जुन बोले– इस प्रकार निरन्तर प्रयत्न में लगे हुए जो भक्त आपकी भली-भाँति उपासना करते हैं और जो अव्यक्त अक्षर की उपासना करते हैं, उनमें उत्तम योगवेत्ता कौन हैं?" टिप्पणी ---------- सततयुक्ताः – एवं सततयुक्ताः?  नैरन्तर्येण भगवत्कर्मादौ यथोक्ते अर्थे समाहिताः सन्तः प्रवृत्ता इत्यर्थः। अव्यक्तम् – ये  भक्ताः अनन्यशरणाःसन्तः त्वां यथादर्शितं विश्वरूपं पर्युपासते ध्यायन्ति ये चान्येऽपि त्यक्तसर्वैषणाः संन्यस्तसर्वकर्माणः यथाविशेषितं ब्रह्म अक्षरं निरस्तसर्वोपाधित्वात् अव्यक्तम् अकरणगोचरम्। व्यक्तम् – यत् हि करणगोचरं तत् व्यक्तम् उच्यते। श्रीरामानुजगीताभाष्यम् ----------------------------- एवं ‘मत्कर्मकृत्’ (गीता,11/55) इत्यादिना उक्तेन प्रकारेण सततयुक्ताः भगवन्तं त्वाम् एव परं प्राप्यं मन्वाना ये भक्ताः त्वां सकलविभूतियुक्तम् अनवधिकाति...

श्री राधा कृपा कटाक्ष स्त्रोत्र - वैदिक सागर

॥ श्री राधा कृपा कटाक्ष स्त्रोत्र ॥ मुनीन्दवृन्दवन्दिते त्रिलोकशोकहारिणी, प्रसन्नवक्त्रपंकजे निकंजभूविलासिनी। व्रजेन्दभानुनन्दिनी व्रजेन्द सूनुसंगते, कदा करिष्यसीह मां कृपा-कटाक्ष-भाजनम्॥  (१)भावार्थ : समस्त मुनिगण आपके चरणों की वंदना करते हैं, आप तीनों लोकों का शोक दूर करने वाली हैं, आप प्रसन्नचित्त प्रफुल्लित मुख कमल वाली हैं, आप धरा पर निकुंज में विलास करने वाली हैं। आप राजा वृषभानु की राजकुमारी हैं, आप ब्रजराज नन्द किशोर श्री कृष्ण की चिरसंगिनी है, हे जगज्जननी श्रीराधे माँ! आप मुझे कब अपनी कृपा दृष्टि से कृतार्थ करोगी ? अशोकवृक्ष वल्लरी वितानमण्डपस्थिते, प्रवालज्वालपल्लव प्रभारूणाङि्घ् कोमले। वराभयस्फुरत्करे प्रभूतसम्पदालये, कदा करिष्यसीह मां कृपा-कटाक्ष-भाजनम्॥  (२)भावार्थ : आप अशोक की वृक्ष-लताओं से बने हुए मंदिर में विराजमान हैं, आप सूर्य की प्रचंड अग्नि की लाल ज्वालाओं के समान कोमल चरणों वाली हैं, आप भक्तों को अभीष्ट वरदान, अभय दान देने के लिए सदैव उत्सुक रहने वाली हैं। आप के हाथ सुन्दर कमल के समान हैं, आप अपार ऐश्वर्य की भंङार स्वामिनी हैं, हे सर्वेश्वरी...

पवित्र गीता जी का ज्ञान किसने कहा - वैदिक सागर

पवित्र गीता जी का ज्ञान किसने कहा पवित्र गीता जी के ज्ञान को उस समय बोला गया था जब महाभारत का युद्ध होने जा रहा था। अर्जुन ने युद्ध करने से इन्कार कर दिया था। युद्ध क्यों हो रहा था? इस युद्ध को धर्मयुद्ध की संज्ञा भी नहीं दी जा सकती क्योंकि दो परिवारों का सम्पत्ति वितरण का विषय था। कौरवों तथा पाण्डवों का सम्पत्ति बंटवारा नहीं हो रहा था। कौरवों ने पाण्डवों को आधा राज्य भी देने से मना कर दिया था। दोनों पक्षों का बीच-बचाव करने के लिए प्रभु श्री कृष्ण जी तीन बार शान्ति दूत बन कर गए। परन्तु दोनों ही पक्ष अपनी-अपनी जिद्द पर अटल थे। श्री कृष्ण जी ने युद्ध से होने वाली हानि से भी परिचित कराते हुए कहा कि न जाने कितनी बहन विधवा होंगी ? न जाने कितने बच्चे अनाथ होंगे ? महापाप के अतिरिक्त कुछ नहीं मिलेगा। युद्ध में न जाने कौन मरे, कौन बचे ? तीसरी बार जब श्री कृष्ण जी समझौता करवाने गए तो दोनों पक्षों ने अपने-अपने पक्ष वाले राजाओं की सेना सहित सूची पत्रा दिखाया तथा कहा कि इतने राजा हमारे पक्ष में हैं तथा इतने हमारे पक्ष में। जब श्री कृष्ण जी ने देखा कि दोनों ही पक्ष टस से मस नहीं हो रहे हैं,...

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता का महत्व - वैदिक सागर

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता का महत्व अथ प्रथमोऽध्यायः- अर्जुनविषादयोग (मोह से व्याप्त हुए अर्जुन के कायरता, स्नेह और शोकयुक्त वचन ) अर्जुन उवाच दृष्टेवमं स्वजनं कृष्ण युयुत्सुं समुपस्थितम्‌ ॥ सीदन्ति मम गात्राणि मुखं च परिशुष्यति । वेपथुश्च शरीरे में रोमहर्षश्च जायते ॥ भावार्थ : अर्जुन बोले- हे कृष्ण! युद्ध क्षेत्र में डटे हुए युद्ध के अभिलाषी इस स्वजनसमुदाय को देखकर मेरे अंग शिथिल हुए जा रहे हैं और मुख सूखा जा रहा है तथा मेरे शरीर में कम्प एवं रोमांच हो रहा है॥28वें का उत्तरार्ध और 29॥ गाण्डीवं स्रंसते हस्तात्वक्चैव परिदह्यते । न च शक्नोम्यवस्थातुं भ्रमतीव च मे मनः ॥ भावार्थ : हाथ से गांडीव धनुष गिर रहा है और त्वचा भी बहुत जल रही है तथा मेरा मन भ्रमित-सा हो रहा है, इसलिए मैं खड़ा रहने को भी समर्थ नहीं हूँ॥30॥ निमित्तानि च पश्यामि विपरीतानि केशव । न च श्रेयोऽनुपश्यामि हत्वा स्वजनमाहवे ॥ भावार्थ :  हे केशव! मैं लक्षणों को भी विपरीत ही देख रहा हूँ तथा युद्ध में स्वजन-समुदाय को मारकर कल्याण भी नहीं देखता॥31॥ न काङ्‍क्षे विजयं कृष्ण न च राज्यं सुखानि च । किं नो राज...