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Showing posts with the label DHARAM GYAN

घास के तिनके का महत्व - वैदिक सागर

घास के तिनके का महत्व :  रामायण में एक घास के तिनके का भी रहस्य है, जो हर किसी को नहीं मालूम क्योंकि आज तक हमने हमारे ग्रंथो में सिर्फ पढ़ा, समझने की कोशिश नहीं की। रावण ने जब माँ सीता जी का हरण करके लंका ले गया तब लंका मे सीता जी वट वृक्ष के नीचे बैठ कर चिंतन करने लगी। रावण बार बार आकर माँ सीता जी को धमकाता था, लेकिन माँ सीता जी कुछ नहीं बोलती थी।  यहाँ तक की रावण ने श्री राम जी के वेश भूषा मे आकर माँ सीता जी को भ्रमित करने की भी कोशिश की लेकिन फिर भी सफल नहीं हुआ, रावण थक हार कर जब अपने शयन कक्ष मे गया तो मंदोदरी ने उससे कहा आप तो राम का वेश धर कर गये थे, फिर क्या हुआ? रावण बोला- जब मैं राम का रूप लेकर सीता के समक्ष गया तो सीता मुझे नजर ही नहीं आ रही थी। रावण अपनी समस्त ताकत लगा चुका था लेकिन जिस जगत जननी माँ को आज तक कोई नहीं समझ सका, उन्हें रावण भी कैसे समझ पाता ! रावण एक बार फिर आया और बोला मैं तुमसे सीधे सीधे संवाद करता हूँ लेकिन तुम कैसी नारी हो कि मेरे आते ही घास का तिनका उठाकर उसे ही घूर-घूर कर देखने लगती हो, क्या घास का तिनका तुम्हें राम स...

मौन का मूल्य - वैदिक सागर

मौन का मूल्य - वैदिक सागर     गांधी जी ने मौन को सत्य के उपासक के आध्यात्मिक अनुशासन का एक अनिवार्य हिस्सा माना है । मनुष्य की सच्चाई को अतिरंजित करने, संशोधित करने या दबाने की स्वाभाविक कमजोरी है।        लेकिन एक आदमी जो हर शब्द बोलता है, वह कम ही बोलता है। हालांकि, विडंबना यह है कि बहुत से लोग बोलने के लिए उत्सुक हैं परन्तु वे यह नहीं सोचते कि क्या दूसरे सुनना चाहते हैं या नहीं।  वे यह नहीं समझते कि ऐसी स्थिति में उनकी बात बस समय और ऊर्जा का अपव्यय है।        गांधीजी का मानना था कि यदि लोग मौन का गुण जानते हैं तो दुनिया का आधा दुख खत्म हो जाएगा। आधुनिक सभ्यता की शुरुआत से पहले, हम शांति से लगभग सात से आठ घंटे तक बोलने के बिना सो सकते थे। लेकिन आधुनिक सभ्यता ने दिन को  रात में तथा सुनहरे मौन को शोर -शराबे  में परिवर्तित कर दिया है । दिव्य रेडियो हमेशा विवेक के माध्यम से हमसे बात कर रहा है लेकिन हम इसे सुनने के लिए खुद को उपलब्ध नहीं कराते हैं।         इसके विपरीत, हम बिन...

कछुए के प्रतीक को घर में रखने के कुछ लाभ - वैदिक सागर

कछुए के प्रतीक को घर में रखने के कुछ लाभ - वैदिक सागर कछुए के प्रतीक को घर में रखने के कुछ लाभ - वैदिक सागर → कछुए के प्रतीक को घर में रखने से आर्थिक उन्नति तथा सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।  → वास्तु और फेंगशुई के अनुसार कछुआ एक प्रभावशाली यंत्र है, जिससे वास्तु दोष का निवारण होकर घर में खुशहाली आती है। → कछुए को शांत तथा मंदगति से चलने वाला दीर्घजीवी प्राणी माना गया है।  → सनातन धर्म के अनुसार कछुए को शुभता का प्रतीक भी माना जाता है। → कछुए के प्रतीक को कभी भी बेडरूम में नहीं रखना चाहिए।  → कछुए का सर्वोत्तम स्थान ड्राइंग रूम माना गया है।  → हमेशा घर के अंदर की ओर कछुए का मुंह रखना सर्वदा फलदायी है।  → कछुए के संबंध में ऐसी मान्यता है कि कछुए के प्रतीक को घर में रखने से निरंतर आर्थिक उन्नति होती है। loading...

आंत्रिक शांति के बिना गरीब होता है मनुष्य - वैदिक सागर

आंत्रिक शांति के बिना गरीब होता है मनुष्य - वैदिक सागर  एक राजा के दरबार में कोई आम ले आया। राजा ने कभी आम नहीं खाया था इसलिए उसने पूछा, "यह क्या है" जो व्यक्ति आम लाया था, उसने कहा, "महाराज ! यह आम है। यह बहुत ही अच्छा फल है, आप इसे खाकर देखिए।" राजा ने कहा, "मुझें नहीं खाना है। मेरे दरबार में जो लोग बैठे हैं इन्हें खिलाओ। ये लोग खाकर मुझे बताएंगे कि ये आम कैसा फल है? "राजा ने अपने प्रधान को आम दिया और उसे खाने के लिए कहा । उसने खाया और कहा, "महाराज यह तो बहुत बढ़िया" है। यह नरम है, मीठा है और इसमें रस भी है। राजा ने कहा, "अब भी मुझे समझ में नहीं आया।" आखिर दरबार में एक अन्य विद्वान सज्जन को आम दिया गया ताकि वह खाकर राजा को उसके चारे में सटीक जानकारी दे सके मगर वह खाने की बजाय आम को काटकर सीधे राजा के पास ले आए और कहा, "राजन इसे आप खाइए। जब तक आप नहीं खाएंगे तब तक दूसरों के खाने से आपको कुछ पता नहीं लगेगा कि यह क्या चीज है। यह व्यक्तिगत अनुभव की बात है। "राजा आम को चखता है और चखने के बाद कहता है, "ह...

मृत्यु के बारे में कुछ दिलचस्प तथ्य - वैदिक सागर

मृत्यु  के बारे में कुछ दिलचस्प तथ्य मरने के उपरांत 47 दिन बाद आत्मा पहुंचती है यमलोक, आइये जाने क्या - क्या होता है रास्ते में मृत्यु एक ऐसा सच है जिसे कोई भी झुठला नहीं सकता। हिंदू धर्म में मृत्यु के बाद स्वर्ग-नरक की मान्यता है। पुराणों के अनुसार जो मनुष्य अच्छे कर्म करता है, वह स्वर्ग जाता है,जबकि जो मनुष्य जीवन भर बुरे कामों में लगा रहता है, उसे यमदूत नरक में ले जाते हैं। सबसे पहले जीवात्मा को यमलोक लेजाया जाता है। वहां यमराज उसके पापों के अनुसार उसे सजा देते हैं। मृत्यु के बाद जीव - आत्मा यमलोक तक किस प्रकार जाती है, इसका विस्तृत वर्णन गरुड़ पुराण में है। गरुड़ पुराण में यह भी बताया गया है कि किस प्रकार मनुष्य के प्राण निकलते हैं और किस प्रकार प्रेत का रूप लेता है। गरुड़ पुराण के अनुसार जिस मनुष्य की मृत्यु होने वाली होती है, वह बोल नहीं पाता है। अंत समय में उसमें दिव्य दृष्टि उत्पन्न होती है और वह संपूर्ण संसार को एकरूप समझने लगता है। उसकी सभी इंद्रियां नष्ट हो जाती हैं। वह जड़ अवस्था में आ जाता है, यानी हिलने-डुलने में असमर्थ हो जाता है। इसके बाद उस...

पुरुष का श्रृंगार तो स्वयं प्रकृति ने किया है..

पुरुष का श्रृंगार तो स्वयं प्रकृति ने किया है.. स्त्रियाँ काँच का टुकड़ा हैं..जो मेकअप की रौशनी पड़ने पर ही चमकती हैं.. किन्तु पुरुष हीरा है जो अँधेरे में भी चमकता है और उसे मेकअप की कोई आवश्यकता नहीं होती। खूबसूरत मोर होता है मोरनी नहीं.. मोर रंग - बिरंगा और हरे - नीले रंग से सुशोभित..जबकि मोरनी काली सफ़ेद.. मोर के पंख होते हैं इसीलिए उन्हें मोरपंख कहते हैं..मोरनी के पंख नहीं होते.. दांत हाथी के होते हैं,हथिनी के नहीं। हांथी के दांत बेशकीमती होते हैं। नर हाथी मादा हाथी के मुकाबले बहुत खूबसूरत होता है। कस्तूरी नर हिरन में पायी जाती है। मादा हिरन में नहीं। नर हिरन मादा हिरन के मुकाबले बहुत सुन्दर होता है। मणि नाग के पास होती है ,नागिन के पास नहीं। नागिन ऐसे नागों की दीवानी होती है जिनके पास मणि होती है। रत्न महासागर में पाये जाते हैं, नदियो में नहीं..और अंत में नदियों को उसी महासागर में गिरना पड़ता है। संसार के बेशकीमती तत्व इस प्रकृति ने पुरुषों को सौंपे.. प्रकृति ने पुरुष के साथ अन्याय नहीं किया.. 9 महीने स्त्री के गर्भ में रहने के बावजूद भी औलाद का चेहर...

भगवान को ये लोग हैं सबसे प्यारे - हिंदी प्रेरणादायक कहानी - वैदिक सागर

भगवान को ये लोग हैं सबसे प्यारे, जानें क्या आप हैं उन में शामिल एक राजा बहुत बड़ा प्रजापालक था, हमेशा प्रजा के हित में प्रयत्नशील रहता था। वह इतना कर्मठ था कि अपना सुख, ऐशो-आराम सब छोड़कर सारा समय जन-कल्याण में लगा देता था। यहां तक कि जो मोक्ष का साधन है अर्थात भगवद्-भजन, उसके लिए भी वह समय नहीं निकाल पाता था। एक सुबह राजा वन की तरफ भ्रमण करने के लिए जा रहा था कि उसे एक देव के दर्शन हुए। राजा ने देव को प्रणाम करते हुए उनका अभिनन्दन किया और देव के हाथों में एक लम्बी-चौड़ी पुस्तक देखकर उनसे पूछा,‘‘महाराज, आपके हाथ में यह क्या है?’’ देव बोले,‘‘राजन! यह हमारा बहीखाता है, जिसमें सभी भजन करने वालों के नाम हैं।’’ राजा ने निराशायुक्त भाव से कहा,‘‘कृपया देखिए तो इस पुस्तक में कहीं मेरा नाम भी है या नहीं?’’ देव महाराज किताब का एक-एक पृष्ठ उलटने लगे, परन्तु राजा का नाम कहीं भी नजर नहीं आया। राजा ने देव को चिंतित देखकर कहा,‘‘महाराज ! आप चिंतित न हों, आपके ढूंढने में कोई भी कमी नहीं है। वास्तव में यह मेरा दुर्भाग्य है कि मैं भजन-कीर्तन के लिए समय नहीं निकाल पाता, और इसीलिए मेरा नाम...

मनुष्य का मन एक हाथी जैसा - वैदिक सागर

मनुष्य का मन एक हाथी जैसा - भगवान् को बार-बार याद करो एक हाथी है उसे नहला धुला कर छोड़ दो तब फिर वह क्या करेगा ? मिट्टी में खेलेगा और अपने शरीर को फिर गन्दा कर लेगा, कोई उस पर बैठे तो उसका शरीर भी गन्दा अवश्य होगा । लेकिन यदि हाथी को स्नान कराने के बाद पक्के बाड़े में बाँध दिया जाये ?-तब फिर हाथी अपना शरीर गन्दा नहीं कर सकेगा । मनुष्य का मन भी हाथी के समान है एक बार ध्यान साधन और भगवान् के भजन से वह शुद्ध हो गया तो उसे स्वतन्त्र नहीं कर देना चाहिये । इस संसार में पवित्रता भी है, मन का स्वभाव है वह गन्दगी में जायेगा और मनुष्य देह को दूषित करने से नहीं चूकेगा इसलिये उसे गन्दगी से बचाये रखने के लिये एक बाड़े की जरूरत होती है जिसमें वह घिरा रहे । गन्दगी की सम्भावनाओं वाले स्थानों में न जा सके । ईश्वर का भजन उसका निरन्तर ध्यान एक बाड़ा है जिसमें मन को बन्द रखा जाना चाहिये, तभी साँसारिक संसर्ग से उत्पन्न दोष और मलिनता से बचाव सम्भव है। भगवान् को बार-बार याद करते रहोगे तो मन अस्थायी सुखों के आकर्षण और पाप से बचा रहेगा और अपने जीवन के स्थायी लक्ष्य की याद बनी रहेगी । उस समय दूषित...

भारत को आखिर बॉलीवुड ने दिया क्या है ? - वैदिक सागर

भारत को आखिर बॉलीवुड ने दिया क्या है ? निवेदन एक बार जरूर पढे बॉलीवुड ने भारत को इतना सब कुछ दिया है, तभी तो आज देश यहाँ है ... 1. बलात्कार गैंग रेप करने के तरीके। 2. विवाह किये बिना लड़का लड़की का शारीरिक सम्बन्ध बनाना। 3. विवाह के दौरान लड़की को मंडप से भगाना 4. चोरी डकैती करने के तरीके। 5. भारतीय संस्कारो का उपहास उडाना। 6. लड़कियो को छोटे कपडे पहने की सीख देना.... जिसे फैशन का नाम देना। 7. दारू सिगरेट चरस गांजा कैसे पिया और लाया जाये। 8. गुंडागर्दी कर के हफ्ता वसूली करना। 9. भगवान का मजाक बनाना और अपमानित करना। 10. पूजा पाठ यज्ञ करना पाखण्ड है व नमाज पढ़ना ईश्वर की सच्ची पूजा है। 11. भारतीयों को अंग्रेज बनाना। 12. भारतीय संस्कृति को मूर्खता पूर्ण बताना और पश्चिमी संस्कृति को श्रेष्ठ बताना। 13. माँ बाप को वृध्दाश्रम छोड़ के आना। 14. गाय पालन को मज़ाक बनाना और कुत्तों को उनसे श्रेष्ठ बताना और पालना सिखाना। 15. रोटी हरी सब्ज़ी खाना गलत बल्कि रेस्टोरेंट में पिज़्ज़ा बर्गर कोल्ड ड्रिंक और नॉन वेज खाना श्रेष्ठ है। 16. पंडितों को जोकर के रूप में दिखाना, चोटी रख...

सहजं कर्म कौन्तेय सदोषमपि न त्यजेत् - गीता श्लोक - वैदिक सागर

सहजं कर्म कौन्तेय सदोषमपि न  त्यजेत् |  सर्वारम्भा हि दोषेण धूमेनाग्निरिवावृताः || ४८ || सहजम् – एकसाथ उत्पन्न; कर्म – कर्म; कौन्तेय – हे कुन्तीपुत्र; स-दोषम् – दोषयुक्त; अपि – यद्यपि; न – कभी नहीं; त्यजेत् – त्यागना चाहिए; सर्व-आरम्भाः – सारे उद्योग; हि – निश्चय ही; दोषेण – दोष से; धूमेन – धुएँ से; अग्निः – अग्नि; इव – सदृश; आवृताः – ढके हुए | प्रत्येक उद्योग (प्रयास) किसी न किसी दोष से आवृत होता है, जिस प्रकार अग्नि धुएँ से आवृत रहती है | अतएव हे कुन्तीपुत्र! मनुष्य को चाहिए कि स्वभाव से उत्पन्न कर्म को, भले ही वह दोषपूर्ण क्यों न हो, कभी त्यागे नहीं | तात्पर्य : बद्ध जीवन में सारा कर्म भौतिक गुणों से दूषित रहता है | यहाँ तक कि ब्राह्मण तक को ऐसे यज्ञ करने पड़ते हैं, जिनमें पशुहत्या अनिवार्य है | इसी प्रकार क्षत्रिय चाहे कितना ही पवित्र क्यों न हो, उसे शत्रुओं से युद्ध करना पड़ता है | वह इससे बच नहीं सकता | इसी प्रकार एक व्यापारी को चाहे वह कितना ही पवित्र क्यों न हो, अपने व्यापार में बने रहने के लिए कभी-कभी लाभ को छिपाना पड़ता है, या कभी-कभी कालाबाजार चलाना पड़ता...

विद्याविनयसम्पन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि - गीता श्लोक - वैदिक सागर

विद्याविनयसम्पन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि । शुनि चैव श्वपाके च पण्डिता: समदर्शिन: ॥१८॥ ज्ञानी महापुरुष विद्या-विनययुक्त ब्राह्मण में और चाण्डाल में तथा गाय, हाथी एवं कुत्ते में भी समरूप परमात्मा को देखनेवाले होते हैं। व्याख्या-  बेसमझ लोगों के द्वारा यह श्लोक प्रायः सम-व्यवहार के उदाहरण रूप में प्रस्तुत किया जाता है। परन्तु इस श्लोक में ‘समवर्तिनः’ न कह कर ‘समदर्शिनः’ कहा गया है, जिसका अर्थ है- समदृष्टि, न कि सम-व्यवहार। यदि स्थूलदृष्टि से भी देखें तो ब्राह्मण , चाण्डाल, गाय , हाथी और कुत्ते के प्रति सम-व्यवहार असम्भव है। इनमें विषमता अनिवार्य है। जैसे, पूजन विद्या-विनययुक्त ब्राह्मण का ही हो सकता है, न कि चाण्डाल का; दूध गाय का ही पीया जाता है, न कि कुतिया का; सवारी हाथी पर ही की जा सकती है, न कि कुत्ते पर। जैसे शरीर के प्रत्येक अंग के व्यवहार में विषमता अनिवार्य है, पर सुख-दुःख में समता होती है अर्थात् शरीर के किसी भी अंग का सुख हमारा सुख होता है और दुःख हमारा दुःख। हमें किसी भी अंग की पीड़ा सह्य नहीं होती। ऐसे ही प्राणियों से विषम (यथायोग्य) व्यवहार करते हुए भी उनके सु...

समुंदर मंथन के दौरान प्राप्त चौदह रत्न - वैदिक सागर

समुंदर मंथन के दौरान प्राप्त चौदह रत्न - वैदिक सागर  1. कालकूट विष समुद्र मंथन में से सबसे पहले कालकूट विष निकला, जिसे भगवान शिव ने ग्रहण कर लिया। इससे तात्पर्य है कि अमृत (परमात्मा) हर इंसान के मन में स्थित है। अगर हमें अमृत की इच्छा है तो सबसे पहले हमें अपने मन को मथना पड़ेगा। जब हम अपने मन को मथेंगे तो सबसे पहले बुरे विचार ही बाहर निकलेंगे। यही बुरे विचार विष है। हमें इन बुरे विचारों को परमात्मा को समर्पित कर देना चाहिए और इनसे मुक्त हो जाना चाहिए। 2. कामधेनु समुद्र मंथन में दूसरे क्रम में निकली कामधेनु। वह अग्निहोत्र (यज्ञ) की सामग्री उत्पन्न करने वाली थी। इसलिए ब्रह्मवादी ऋषियों ने उसे ग्रहण कर लिया। कामधेनु प्रतीक है मन की निर्मलता की। क्योंकि विष निकल जाने के बाद मन निर्मल हो जाता है। ऐसी स्थिति में ईश्वर तक पहुंचना और भी आसान हो जाता है। 3. उच्चैश्रवा घोड़ा समुद्र मंथन के दौरान तीसरे नंबर पर उच्चैश्रवा घोड़ा निकला। इसका रंग सफेद था। इसे असुरों के राजा बलि ने अपने पास रख लिया। लाइफ मैनेजमेंट की दृष्टि से देखें तो उच्चैश्रवा घोड़ा मन की गति का प्रतीक है। मन की ग...

धर्म ज्ञान - वैदिक सागर

धर्म ज्ञान श्री कृष्ण के बारे में कूछ रोचक जानकारियां कृष्ण को पूर्णावतार कहा गया है। कृष्ण के जीवन में वह सबकुछ है जिसकी मानव को आवश्यकता होती है। कृष्ण गुरु हैं, तो शिष्य भी। आदर्श पति हैं तो प्रेमी भी। आदर्श मित्र हैं, तो शत्रु भी। वे आदर्श पुत्र हैं, तो पिता भी। युद्ध में कुशल हैं तो बुद्ध भी। कृष्ण के जीवन में हर वह रंग है, जो धरती पर पाए जाते हैं इसीलिए तो उन्हें पूर्णावतार कहा गया है। मूढ़ हैं वे लोग, जो उन्हें छोड़कर अन्य को भजते हैं… ‘भज गोविन्दं मुढ़मते। आठ का अंक : """"""”"""""""""""""""  कृष्ण के जीवन में आठ अंक का अजब संयोग है। उनका जन्म आठवें मनु के काल में अष्टमी के दिन वसुदेव के आठवें पुत्र के रूप में जन्म हुआ था। उनकी आठ सखियां, आठ पत्नियां, आठमित्र और आठ शत्रु थे। इस तरह उनके जीवन में आठ अंक का बहुत संयोग है। कृष्ण के नाम : """""""""""""""""""""...