मौन का मूल्य - वैदिक सागर गांधी जी ने मौन को सत्य के उपासक के आध्यात्मिक अनुशासन का एक अनिवार्य हिस्सा माना है । मनुष्य की सच्चाई को अतिरंजित करने, संशोधित करने या दबाने की स्वाभाविक कमजोरी है। लेकिन एक आदमी जो हर शब्द बोलता है, वह कम ही बोलता है। हालांकि, विडंबना यह है कि बहुत से लोग बोलने के लिए उत्सुक हैं परन्तु वे यह नहीं सोचते कि क्या दूसरे सुनना चाहते हैं या नहीं। वे यह नहीं समझते कि ऐसी स्थिति में उनकी बात बस समय और ऊर्जा का अपव्यय है। गांधीजी का मानना था कि यदि लोग मौन का गुण जानते हैं तो दुनिया का आधा दुख खत्म हो जाएगा। आधुनिक सभ्यता की शुरुआत से पहले, हम शांति से लगभग सात से आठ घंटे तक बोलने के बिना सो सकते थे। लेकिन आधुनिक सभ्यता ने दिन को रात में तथा सुनहरे मौन को शोर -शराबे में परिवर्तित कर दिया है । दिव्य रेडियो हमेशा विवेक के माध्यम से हमसे बात कर रहा है लेकिन हम इसे सुनने के लिए खुद को उपलब्ध नहीं कराते हैं। इसके विपरीत, हम बिन...
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