नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया
न बहुना श्रुतेन।
यमेवैष वृणुते तेन लभ्यस्वतस्यैष
आत्मा विवृणुते तनूं स्वाम्।।
"यह आत्मा न प्रवचन से,न बुद्धि से ,न बहुत सुनने से प्राप्त (साक्षात्कार) होता है । यह आत्मा उसको प्राप्त होता है ,जो इसका वरण करता है । उसे यह आत्मा अपना यथार्थ स्वरूप प्रकट कर देता है ।"
भावार्थ
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यहां आत्मा को पाने का अर्थ है – आत्मा के वास्तविक स्वरूप का ज्ञान प्राप्त करना । धार्मिक गुरुओं के प्रवचन सुनने से, शास्त्रों के विद्वत्तापूर्ण अध्ययन से, अथवा ढेर सारे शास्त्रीय वचनों को सुनने से यह ज्ञान नहीं मिल सकता है । इस ज्ञान का अधिकारी वह है जो मात्र उसे पाने की आकांक्षा रखता है ।
आत्मसाक्षात्कार के लिए प्यास चाहिए ,मुमुक्षा चाहिए । आत्मसाक्षात्कार बुद्धि का विषय नहीं है ,इसे बुद्धि से नहीं पा सकते हैं। प्रवचन आदि सुनने -सुनाने से ,आत्मसाक्षात्कार नहीं होता है । आप रोज कोई ग्रन्थ का स्वाध्याय करें , या सत्संग करें इससे आत्मज्ञान नहीं होगा । आत्मज्ञान के लिए मुमुक्षा ,प्यास चाहिए । आत्मा जब आत्मा को वरण करता है , तभी आत्मसाक्षात्कार होता है ।
तात्पर्य
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जिसने भी भौतिक इच्छाओं से मुक्ति पा ली हो और जिसके मन में केवल उस परमात्मा के स्वरूप को जानने की लालसा शेष रह गयी हो वही उस ज्ञान का हकदार है । जो ऐहिक सुख-दुःखों, नाते-रिश्तों, क्रियाकलापों में उलझा रहता है उसे वह ज्ञान नहीं प्राप्त हो सकता है । जिस व्यक्ति का भौतिक संसार से मोह समाप्त हो चला हो वस्तुतः वही कर्मफलों से मुक्त हो जाता है और उसका ही परब्रह्म से साक्षात्कार हो सकता है ।
संस्कृतार्थः
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इति विशेषणात् परेण आत्मना वरणीयताहेतुभूतं स्मर्यमाणविषयस्य अत्यर्थप्रियत्वेन स्वयम् अपि अत्यर्थ प्रियरूपं स्मृतिसन्तानम् एव उपासनशब्दवाच्यम् इति हि निश्चीयते, तद् एव भक्तिः इत्युच्यते ‘स्नेहपूर्वमनुध्यानं भक्तिरित्युच्यते बुधैः’ इति वचनात्। ‘अतस्तमेवं विद्वानमृत इह भवति’ (नृ0 पू0 उ0 1/6) ‘नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय’(श्वेता0 3/8) ‘नाहं वेदैर्न तपसा न दानेन न चेज्यया। शक्य एवंविधो द्रष्टुं दृष्टवानसि मां यथा।। भक्त्या त्वनन्यया शक्य अहमेवंविधोऽर्जुन। ज्ञातुं द्रष्टु च तत्त्वेन प्रवेष्टुं च परन्तप।।’ (श्वेता0 11/53-54)
इत्यनयोः एकार्थत्वं सिद्धं भवति।
उपर्युक्त का हिन्दी भाव
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‘यह आत्मा न तो प्रवचन से ही प्राप्त हो सकता है, न बुद्धि से और न बहुत सुनने से ही। यह जिसको वरण कर लेता है, उसी को मिलता है। उसी के लिये यह परमात्मा अपना रूप प्रकट कर देता है।’
इस विशेषण से भी यह निश्चय होता है कि परमपुरुष के द्वारा वरण किये जाने योग्य बनने का जो कारण है और स्मरण किया जाने वाला विषय अत्यन्त प्रिय होने से जो स्वयं भी अत्यन्त प्रियरूप है, ऐसे चिन्तन के प्रवाह को ही उपासना कहा गया है। उसी को ‘भक्ति’ कहते हैं। यही बात ‘स्नेहपूर्वक बार-बार ध्यान करने को ही ज्ञानीजन भक्ति कहते हैं। ‘ उसी को इस प्रकार जानने वाला- विद्वान् यहाँ अर्मत्य हो जाता है। परम पुरुष की प्राप्ति के लिये दूसरा कोई मार्ग(उपाय) नहीं दीखता। इस वाक्य की और ‘नाहं वेदैर्न तपसा न दानेन न चेज्यया। शक्य एवंविधो द्रष्टं दृष्टवानसि मां यथा।।(गीता 11/53) भक्त्या त्वनन्यया शक्य अहमेवंविधोऽर्जुन। ज्ञातुं द्रष्टुं च तत्त्वेन प्रवेष्टुं च परन्तप।।’(गीता 11/54) इस वचनों की एकार्थता से ऐसा ही सिद्ध होता है।
न बहुना श्रुतेन।
यमेवैष वृणुते तेन लभ्यस्वतस्यैष
आत्मा विवृणुते तनूं स्वाम्।।
"यह आत्मा न प्रवचन से,न बुद्धि से ,न बहुत सुनने से प्राप्त (साक्षात्कार) होता है । यह आत्मा उसको प्राप्त होता है ,जो इसका वरण करता है । उसे यह आत्मा अपना यथार्थ स्वरूप प्रकट कर देता है ।"
भावार्थ
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यहां आत्मा को पाने का अर्थ है – आत्मा के वास्तविक स्वरूप का ज्ञान प्राप्त करना । धार्मिक गुरुओं के प्रवचन सुनने से, शास्त्रों के विद्वत्तापूर्ण अध्ययन से, अथवा ढेर सारे शास्त्रीय वचनों को सुनने से यह ज्ञान नहीं मिल सकता है । इस ज्ञान का अधिकारी वह है जो मात्र उसे पाने की आकांक्षा रखता है ।
आत्मसाक्षात्कार के लिए प्यास चाहिए ,मुमुक्षा चाहिए । आत्मसाक्षात्कार बुद्धि का विषय नहीं है ,इसे बुद्धि से नहीं पा सकते हैं। प्रवचन आदि सुनने -सुनाने से ,आत्मसाक्षात्कार नहीं होता है । आप रोज कोई ग्रन्थ का स्वाध्याय करें , या सत्संग करें इससे आत्मज्ञान नहीं होगा । आत्मज्ञान के लिए मुमुक्षा ,प्यास चाहिए । आत्मा जब आत्मा को वरण करता है , तभी आत्मसाक्षात्कार होता है ।
तात्पर्य
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जिसने भी भौतिक इच्छाओं से मुक्ति पा ली हो और जिसके मन में केवल उस परमात्मा के स्वरूप को जानने की लालसा शेष रह गयी हो वही उस ज्ञान का हकदार है । जो ऐहिक सुख-दुःखों, नाते-रिश्तों, क्रियाकलापों में उलझा रहता है उसे वह ज्ञान नहीं प्राप्त हो सकता है । जिस व्यक्ति का भौतिक संसार से मोह समाप्त हो चला हो वस्तुतः वही कर्मफलों से मुक्त हो जाता है और उसका ही परब्रह्म से साक्षात्कार हो सकता है ।
संस्कृतार्थः
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इति विशेषणात् परेण आत्मना वरणीयताहेतुभूतं स्मर्यमाणविषयस्य अत्यर्थप्रियत्वेन स्वयम् अपि अत्यर्थ प्रियरूपं स्मृतिसन्तानम् एव उपासनशब्दवाच्यम् इति हि निश्चीयते, तद् एव भक्तिः इत्युच्यते ‘स्नेहपूर्वमनुध्यानं भक्तिरित्युच्यते बुधैः’ इति वचनात्। ‘अतस्तमेवं विद्वानमृत इह भवति’ (नृ0 पू0 उ0 1/6) ‘नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय’(श्वेता0 3/8) ‘नाहं वेदैर्न तपसा न दानेन न चेज्यया। शक्य एवंविधो द्रष्टुं दृष्टवानसि मां यथा।। भक्त्या त्वनन्यया शक्य अहमेवंविधोऽर्जुन। ज्ञातुं द्रष्टु च तत्त्वेन प्रवेष्टुं च परन्तप।।’ (श्वेता0 11/53-54)
इत्यनयोः एकार्थत्वं सिद्धं भवति।
उपर्युक्त का हिन्दी भाव
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‘यह आत्मा न तो प्रवचन से ही प्राप्त हो सकता है, न बुद्धि से और न बहुत सुनने से ही। यह जिसको वरण कर लेता है, उसी को मिलता है। उसी के लिये यह परमात्मा अपना रूप प्रकट कर देता है।’
इस विशेषण से भी यह निश्चय होता है कि परमपुरुष के द्वारा वरण किये जाने योग्य बनने का जो कारण है और स्मरण किया जाने वाला विषय अत्यन्त प्रिय होने से जो स्वयं भी अत्यन्त प्रियरूप है, ऐसे चिन्तन के प्रवाह को ही उपासना कहा गया है। उसी को ‘भक्ति’ कहते हैं। यही बात ‘स्नेहपूर्वक बार-बार ध्यान करने को ही ज्ञानीजन भक्ति कहते हैं। ‘ उसी को इस प्रकार जानने वाला- विद्वान् यहाँ अर्मत्य हो जाता है। परम पुरुष की प्राप्ति के लिये दूसरा कोई मार्ग(उपाय) नहीं दीखता। इस वाक्य की और ‘नाहं वेदैर्न तपसा न दानेन न चेज्यया। शक्य एवंविधो द्रष्टं दृष्टवानसि मां यथा।।(गीता 11/53) भक्त्या त्वनन्यया शक्य अहमेवंविधोऽर्जुन। ज्ञातुं द्रष्टुं च तत्त्वेन प्रवेष्टुं च परन्तप।।’(गीता 11/54) इस वचनों की एकार्थता से ऐसा ही सिद्ध होता है।

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