गोपीगीतम् – 18
----------------------
"हे प्यारे श्यामसुन्दर ! तुम्हारी यह अभिव्यक्ति व्रज-वनवासियों के सम्पूर्ण दुःख-ताप को नष्ट करने वाली और विश्व का पूर्ण मंगल करने के लिए है । हमारा हृदय तुम्हारे प्रति लालसा से भर रहा है । कुछ थोड़ी सी ऐसी औषधि प्रदान करो, जो तुम्हारे निज जनो के हृदय-रोग को सर्वथा निर्मूल कर दे।"
भावार्थ
---------
हे श्यामसुन्दर! आपका यह प्राकट्य सम्पूर्ण व्रजवासी एवं वनवासी जनों के सब प्रकार के पापों का हनन करने वाला है; साथ ही, विश्व का पूर्ण मंगल करने वाला है। हमारा हृदय आपके सम्मिलन की लालसा से भरपूर है। हे मदन मोेहन! आप प्रकट होकर स्वजनों के हृदय-रोग को उपशमन करने वाली औषध हमको दें। सदा-सर्वदा सर्वव्याप्त परात्पर परब्रह्म प्रभु की प्रकट, अप्रकट एवं प्रकटा-प्रकट ये तीन प्रकार की लीलाएँ होती हैं। अप्रकट लीला चक्षु-गोचर नहीं होती-प्रकट लीला का प्रत्यक्ष अनुभव देवता एवं मानवों को होता है। प्रकटाप्रकट वह लीला है, जिसमें प्रकट के साथ ही अप्रकट दिव्य तत्त्व भी अभिव्यक्त रहता है। अनन्तानन्त ब्रह्माण्ड के प्रत्येक अणु-अणु, परमाणु-परमाणु में परात्पर प्रभु विद्यामान हैं –
इस अखण्ड, अनन्त, निर्विकार परमतत्त्व का अपरोक्ष साक्षात्कार सर्वसाधारण के लिए सम्भव नहीं; यदा-कदा ही सहस्रों-लक्षों में कोई एक ऐसा महापुरुष आविर्भूत होता है, जो इस दिव्य परमतत्त्व का अपरोक्ष अनुभव कर पाता है। यदा-कदा सर्वेश्वर, सर्वशक्तिमान् सर्वाधिष्ठान, सर्व-व्यापी परात्पर प्रभु स्वयं ही अभिव्यक्ति लेते हैं; यह विशिष्ट अभिव्यक्ति ही अवतार है। अदृश्य, अग्राह्य, अव्यपदेश्य, अचिंत्य, अलक्षण, निर्विकार परब्रह्म भक्तानुग्रहार्थ अब-तरित होकर दृष्ट, ग्राह्य, व्यपदेश, चिन्त्य, सगुण एवं साकार सच्चिदा-नन्दघन-स्वरूप् में प्रकट हो जाता है।
तात्पर्य
---------
गोपांगनाएँ कह रहीं हैं, हे श्यामसुन्दर! हम भी इस ब्रज की ही वासिनी हैं परन्तु हमारे दृःखों का पारावार ही नहीं; हे प्रभु! कृपा करो। आप परम उदार हैं, 'स्वजनहृद्रुजां यन्निषूदनम्। त्यज मनाक् च’ स्वजनों के हृदोग का निषूदन करने वाली औषध का कार्पण्य-रहित त्याग करो। अर्थात् कार्पण्य-रहित होकर दे दो। आपके विप्रयोग-जन्य तीव्र ताप की प्रज्वलित ज्वाला से संतप्त हम गोपांगनाओं के लिए त्रुटिमात्र काल भी युगवत् प्रतीत होता है और हम बारम्बार मूर्च्छा को प्राप्त होती हैं; क्षणमात्र के लिए भी आपके मुखचन्द्र के दर्शन से हमारे सन्तापों का शमन हो जायेगा, अतः आप जो स्वभावतः परम उदार हैं, हमारे लिए भी कार्पण्य-रहित होकर हमारे हृच्छयरूप हृद्रोग के निषूदन-हेतु मुखचन्द्र दर्शनरूप औषध प्रदान करें। अपनी भीषण ज्वालाओें से महासमुद्र को भस्म करने वाली वड़वाग्नि भी आपके पाद-पंकज-निःसृत गंग-धारा के संस्पर्श से शीतल हो गई, अतः हे आनन्दकन्द! ‘त्यज मानक् च नः कार्पण्यं अकुर्वन्’ कार्पण्य न करते हुए आप अपने विप्रयोग से प्रज्वलित भीषण वड़वानल से हमारे हृदयरूप महासमुद्र की रक्षा-हेतु भगवती गंगा के उद्गम-स्थान, स्वयं अपने चरणारविन्दों को ही हमारे हृदय-स्थान पर धारण करें। गोपांगनाओं में भगवान् श्रीकृष्ण द्वारा किए गये प्रशन का स्फुरण होता है ; वे भावना करती हैं मानो श्रीकृष्ण कह रहे है- “हे व्रजांगनाओं! यदि तुम्हारे इस हृद्रोग का कोई अन्य उपचार हो तो बाताओं क्योंकि तुम्हारी यह स्पृहा अमाननीय है।” वे उत्तर दे रहीं हैं, हे प्रभो! –
‘त्वत्स्स्पृहात्मनां स्वजनहृद्रुजां त्वयि स्पृहा, त्वद्विषयिणो स्पृहा त्वत्स्पृहा अस्ति यस्य सः त्वत्स्पृहः आत्मा यासां तासाम्, अथवा त्वयि स्पृहायुक्तं आत्मा मनः यासां ता आत्मस्पृहा।’
अर्थात्, "सर्वान्यकामना-शून्य हमारा मन, हमारा अन्तःकरण एकमात्र भगवद्-विषयिणी स्पृहा से, आपके मुखचन्द्र-दर्शन की अभिलाषा से आपके पादारविन्द नखमणि-चन्दिका एवं हस्ताम्बुजों के संस्पर्श की आकांक्षा से संयुक्त है।''
‘तव स्पृहा त्वत् कर्तृका या स्पृहा सा त्वत्सपृहा स्वस्पृहा, त्वत् स्पृहां पूरयितुं आत्मानः यासां तासां त्वत्स्पृहात्मनाम्।’
कुछ गोपांगनाएँ ‘तत्सुख-सुखित्व भाववती’ हैं। वे कह रही हैं, “ हे श्यामसुन्दर! तुम्हारे हृदय में जो अस्मत्-विषयक स्पृहा है, जैसे रासेश्वरी नित्य-निकुंजेश्वरी राधा रानी एवं उनकी परमांतरंगा सखीजनों के सम्मिलन की जो उत्कट उत्कण्टा आपमें निरंतर बनी रहती है, अथवा सती वृन्दा जैसे उच्चस्तरीय अन्यान्य भक्तों के सम्मिलन में आपकी जो स्पृहा सदा बनी रहती है, उसकी पूर्ति-हेतु ही हम सर्वस्व का अर्पण कर-कर भी, लोक–परलोक-विचार को तिलांजलि देकर भी, सदा ही व्याकुल रहती हैं; आपकी इस स्पृहा की पूर्ति-हेतु ही हम अपने उरःस्थल पर आपके कर-कमलों एवं चरणारविन्दो का विन्यास तथा अधर-सुधा-रस-दान की आकांक्षा करती हैं; आपकी स्पृहा-पूर्ति ही हमारे जीवन का लक्ष्य है।”
----------------------
व्रजवनोकसां व्यक्तिरङ्ग ते, वृजिनहन्त्र्यलं विश्वमङ्गलम्।
त्यज मनाक् च नस्त्वत्स्पृहात्मनां, स्वजनहृद्रुजां यन्निषूदनम्।।
भावार्थ
---------
हे श्यामसुन्दर! आपका यह प्राकट्य सम्पूर्ण व्रजवासी एवं वनवासी जनों के सब प्रकार के पापों का हनन करने वाला है; साथ ही, विश्व का पूर्ण मंगल करने वाला है। हमारा हृदय आपके सम्मिलन की लालसा से भरपूर है। हे मदन मोेहन! आप प्रकट होकर स्वजनों के हृदय-रोग को उपशमन करने वाली औषध हमको दें। सदा-सर्वदा सर्वव्याप्त परात्पर परब्रह्म प्रभु की प्रकट, अप्रकट एवं प्रकटा-प्रकट ये तीन प्रकार की लीलाएँ होती हैं। अप्रकट लीला चक्षु-गोचर नहीं होती-प्रकट लीला का प्रत्यक्ष अनुभव देवता एवं मानवों को होता है। प्रकटाप्रकट वह लीला है, जिसमें प्रकट के साथ ही अप्रकट दिव्य तत्त्व भी अभिव्यक्त रहता है। अनन्तानन्त ब्रह्माण्ड के प्रत्येक अणु-अणु, परमाणु-परमाणु में परात्पर प्रभु विद्यामान हैं –
‘देस काल दिसि बिदिसिहुँ माहीं।
कहहु सो कहाँ जहाँ प्रभु नाहीं ।।’
इस अखण्ड, अनन्त, निर्विकार परमतत्त्व का अपरोक्ष साक्षात्कार सर्वसाधारण के लिए सम्भव नहीं; यदा-कदा ही सहस्रों-लक्षों में कोई एक ऐसा महापुरुष आविर्भूत होता है, जो इस दिव्य परमतत्त्व का अपरोक्ष अनुभव कर पाता है। यदा-कदा सर्वेश्वर, सर्वशक्तिमान् सर्वाधिष्ठान, सर्व-व्यापी परात्पर प्रभु स्वयं ही अभिव्यक्ति लेते हैं; यह विशिष्ट अभिव्यक्ति ही अवतार है। अदृश्य, अग्राह्य, अव्यपदेश्य, अचिंत्य, अलक्षण, निर्विकार परब्रह्म भक्तानुग्रहार्थ अब-तरित होकर दृष्ट, ग्राह्य, व्यपदेश, चिन्त्य, सगुण एवं साकार सच्चिदा-नन्दघन-स्वरूप् में प्रकट हो जाता है।
तात्पर्य
---------
गोपांगनाएँ कह रहीं हैं, हे श्यामसुन्दर! हम भी इस ब्रज की ही वासिनी हैं परन्तु हमारे दृःखों का पारावार ही नहीं; हे प्रभु! कृपा करो। आप परम उदार हैं, 'स्वजनहृद्रुजां यन्निषूदनम्। त्यज मनाक् च’ स्वजनों के हृदोग का निषूदन करने वाली औषध का कार्पण्य-रहित त्याग करो। अर्थात् कार्पण्य-रहित होकर दे दो। आपके विप्रयोग-जन्य तीव्र ताप की प्रज्वलित ज्वाला से संतप्त हम गोपांगनाओं के लिए त्रुटिमात्र काल भी युगवत् प्रतीत होता है और हम बारम्बार मूर्च्छा को प्राप्त होती हैं; क्षणमात्र के लिए भी आपके मुखचन्द्र के दर्शन से हमारे सन्तापों का शमन हो जायेगा, अतः आप जो स्वभावतः परम उदार हैं, हमारे लिए भी कार्पण्य-रहित होकर हमारे हृच्छयरूप हृद्रोग के निषूदन-हेतु मुखचन्द्र दर्शनरूप औषध प्रदान करें। अपनी भीषण ज्वालाओें से महासमुद्र को भस्म करने वाली वड़वाग्नि भी आपके पाद-पंकज-निःसृत गंग-धारा के संस्पर्श से शीतल हो गई, अतः हे आनन्दकन्द! ‘त्यज मानक् च नः कार्पण्यं अकुर्वन्’ कार्पण्य न करते हुए आप अपने विप्रयोग से प्रज्वलित भीषण वड़वानल से हमारे हृदयरूप महासमुद्र की रक्षा-हेतु भगवती गंगा के उद्गम-स्थान, स्वयं अपने चरणारविन्दों को ही हमारे हृदय-स्थान पर धारण करें। गोपांगनाओं में भगवान् श्रीकृष्ण द्वारा किए गये प्रशन का स्फुरण होता है ; वे भावना करती हैं मानो श्रीकृष्ण कह रहे है- “हे व्रजांगनाओं! यदि तुम्हारे इस हृद्रोग का कोई अन्य उपचार हो तो बाताओं क्योंकि तुम्हारी यह स्पृहा अमाननीय है।” वे उत्तर दे रहीं हैं, हे प्रभो! –
‘त्वत्स्स्पृहात्मनां स्वजनहृद्रुजां त्वयि स्पृहा, त्वद्विषयिणो स्पृहा त्वत्स्पृहा अस्ति यस्य सः त्वत्स्पृहः आत्मा यासां तासाम्, अथवा त्वयि स्पृहायुक्तं आत्मा मनः यासां ता आत्मस्पृहा।’
अर्थात्, "सर्वान्यकामना-शून्य हमारा मन, हमारा अन्तःकरण एकमात्र भगवद्-विषयिणी स्पृहा से, आपके मुखचन्द्र-दर्शन की अभिलाषा से आपके पादारविन्द नखमणि-चन्दिका एवं हस्ताम्बुजों के संस्पर्श की आकांक्षा से संयुक्त है।''
‘तव स्पृहा त्वत् कर्तृका या स्पृहा सा त्वत्सपृहा स्वस्पृहा, त्वत् स्पृहां पूरयितुं आत्मानः यासां तासां त्वत्स्पृहात्मनाम्।’
कुछ गोपांगनाएँ ‘तत्सुख-सुखित्व भाववती’ हैं। वे कह रही हैं, “ हे श्यामसुन्दर! तुम्हारे हृदय में जो अस्मत्-विषयक स्पृहा है, जैसे रासेश्वरी नित्य-निकुंजेश्वरी राधा रानी एवं उनकी परमांतरंगा सखीजनों के सम्मिलन की जो उत्कट उत्कण्टा आपमें निरंतर बनी रहती है, अथवा सती वृन्दा जैसे उच्चस्तरीय अन्यान्य भक्तों के सम्मिलन में आपकी जो स्पृहा सदा बनी रहती है, उसकी पूर्ति-हेतु ही हम सर्वस्व का अर्पण कर-कर भी, लोक–परलोक-विचार को तिलांजलि देकर भी, सदा ही व्याकुल रहती हैं; आपकी इस स्पृहा की पूर्ति-हेतु ही हम अपने उरःस्थल पर आपके कर-कमलों एवं चरणारविन्दो का विन्यास तथा अधर-सुधा-रस-दान की आकांक्षा करती हैं; आपकी स्पृहा-पूर्ति ही हमारे जीवन का लक्ष्य है।”

Comments
Post a Comment