Skip to main content

विद्याविनयसम्पन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि - गीता श्लोक - वैदिक सागर

विद्याविनयसम्पन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि ।
शुनि चैव श्वपाके च पण्डिता: समदर्शिन: ॥१८॥

ज्ञानी महापुरुष विद्या-विनययुक्त ब्राह्मण में और चाण्डाल में तथा गाय, हाथी एवं कुत्ते में भी समरूप परमात्मा को देखनेवाले होते हैं।


व्याख्या-  बेसमझ लोगों के द्वारा यह श्लोक प्रायः सम-व्यवहार के उदाहरण रूप में प्रस्तुत किया जाता है। परन्तु इस श्लोक में ‘समवर्तिनः’ न कह कर ‘समदर्शिनः’ कहा गया है, जिसका अर्थ है- समदृष्टि, न कि सम-व्यवहार। यदि स्थूलदृष्टि से भी देखें तो ब्राह्मण , चाण्डाल, गाय , हाथी और कुत्ते के प्रति सम-व्यवहार असम्भव है। इनमें विषमता अनिवार्य है। जैसे, पूजन विद्या-विनययुक्त ब्राह्मण का ही हो सकता है, न कि चाण्डाल का; दूध गाय का ही पीया जाता है, न कि कुतिया का; सवारी हाथी पर ही की जा सकती है, न कि कुत्ते पर। जैसे शरीर के प्रत्येक अंग के व्यवहार में विषमता अनिवार्य है, पर सुख-दुःख में समता होती है अर्थात् शरीर के किसी भी अंग का सुख हमारा सुख होता है और दुःख हमारा दुःख। हमें किसी भी अंग की पीड़ा सह्य नहीं होती। ऐसे ही प्राणियों से विषम (यथायोग्य) व्यवहार करते हुए भी उनके सुख-दुःख में समभाव होना चाहिये।


इहैव तैर्जित: सर्गो येषां साम्ये स्थितं मन: ।
निर्दोषं हि समं ब्रह्म तस्माद् ब्रह्मणि ते स्थिता: ॥१९॥

जिनका अन्तःकरण समता में स्थित है, उन्होंने इस जीवित-अवस्था में ही सम्पूर्ण संसार को जीत लिया है अर्थात् वे जीवन्मुक्त हो गये हैं; क्योंकि ब्रह्म निर्दोष और सम है, इसलिये वे ब्रह्म में ही स्थित हैं।

व्याख्या- परमात्मतत्त्व में स्थित हुए महापुरुष की पहचान है- बुद्धि में समता आना अर्थात् बुद्धि में राग-द्वेष हर्ष-शोक आदि विकार न होना। जिसकी बुद्धि समता में स्थित हो गयी है, उसे जीवन्मुक्त समझना चाहिये।

Comments

Popular posts from this blog

गिलोय बेल जो 70 रोगों को जड़ से मिटाती है - हेल्थ टिप्स - वैदिक सागर

ये गिलोय एक प्रकार की बेल  है जो 70 रोगों को जड़ से मिटाती है, ये आसानी से गाँव मे मिल जाती है । गिलोय एक प्रकार की लता/बेल है, जिसके पत्ते पान के पत्ते की तरह होते है। यह इतनी अधिक गुणकारी होती है, कि इसका नाम अमृता रखा गया है। आयुर्वेद में गिलोय को बुखार की एक महान औषधि के रूप में माना गया है। गिलोय का रस पीने से शरीर में पाए जाने वाली विभिन्न प्रकार की बीमारियाँ दूर होने लगती हैं। गिलोय की पत्तियों में कैल्शियम, प्रोटीन तथा फास्फोरस पाए जाते है। यह वात, कफ और पित्त नाशक होती है। यह हमारे शरीर की रोगप्रतिरोधक शक्ति को बढाने में सहायता करती है। इसमें विभिन्न प्रकार के महत्वपूर्ण एंटीबायोटिक तथा एंटीवायरल तत्व पाए जाते है जिनसे शारीरिक स्वास्थ्य को लाभ पहुँचता है। यह गरीब के घर की डॉक्टर है क्योंकि यह गाँवो में सहजता से मिल जाती है। गिलोय में प्राकृतिक रूप से शरीर के दोषों को संतुलित करने की क्षमता पाई जाती है। गिलोय एक बहुत ही महत्वपूर्ण आयुर्वेदिक जडीबूटी है। गिलोय बहुत शीघ्रता से फलने फूलनेवाली बेल होती है। गिलोय की टहनियों को भी औषधि के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। गिल...

समुंदर मंथन के दौरान प्राप्त चौदह रत्न - वैदिक सागर

समुंदर मंथन के दौरान प्राप्त चौदह रत्न - वैदिक सागर  1. कालकूट विष समुद्र मंथन में से सबसे पहले कालकूट विष निकला, जिसे भगवान शिव ने ग्रहण कर लिया। इससे तात्पर्य है कि अमृत (परमात्मा) हर इंसान के मन में स्थित है। अगर हमें अमृत की इच्छा है तो सबसे पहले हमें अपने मन को मथना पड़ेगा। जब हम अपने मन को मथेंगे तो सबसे पहले बुरे विचार ही बाहर निकलेंगे। यही बुरे विचार विष है। हमें इन बुरे विचारों को परमात्मा को समर्पित कर देना चाहिए और इनसे मुक्त हो जाना चाहिए। 2. कामधेनु समुद्र मंथन में दूसरे क्रम में निकली कामधेनु। वह अग्निहोत्र (यज्ञ) की सामग्री उत्पन्न करने वाली थी। इसलिए ब्रह्मवादी ऋषियों ने उसे ग्रहण कर लिया। कामधेनु प्रतीक है मन की निर्मलता की। क्योंकि विष निकल जाने के बाद मन निर्मल हो जाता है। ऐसी स्थिति में ईश्वर तक पहुंचना और भी आसान हो जाता है। 3. उच्चैश्रवा घोड़ा समुद्र मंथन के दौरान तीसरे नंबर पर उच्चैश्रवा घोड़ा निकला। इसका रंग सफेद था। इसे असुरों के राजा बलि ने अपने पास रख लिया। लाइफ मैनेजमेंट की दृष्टि से देखें तो उच्चैश्रवा घोड़ा मन की गति का प्रतीक है। मन की ग...

मेरा नटखट नन्हा कान्हा - 2- वैदिक सागर

मेरा नटखट नन्हा कान्हा  ‘धनुष टूट गया'  इस समाचार ने सबसे बड़ा धक्‍का दिया और उस पर जो सेना भेजी गयी, सेनापति सहित वह पूरी सेना दो बालकों ने मार दी। एक भी कोई उनमें से संहार का समाचार देने कंस तक नहीं लौटा। सत्‍यक भी भीरु ही निकला। अन्‍तत: है तो वह भी ब्राह्मण ही। कंस मुट्ठियां बांधकर इधर-से-उधर कक्ष में घूमने लगा। अन्धकार हो चला। कक्ष में सेवक ने प्रदीप जला दिये। कंस सहसा चौंका– ‘उसकी छाया में ये इतने छिद्र छाया के तो मस्‍तक ही नहीं है।’ घबराकर सिर टटोला उसने– ‘सिर तो अपने स्‍थान पर ही है।’ बाहर आ गया कक्ष से वह किन्‍तु आज उसके नेत्रों को क्‍या हो गया है? उसे सब तारे दो-दो दीखते हैं। वृक्षों के पत्ते ऐसे स्‍वर्णिम लगते हैं, जैसे वृक्षों में आग लगी हो। वह फिर कक्ष में आया और फिर चौंका– ‘उसकी छाया पर दो सिर कैसे?’ फिर अपना सिर टटोला उसने। ‘ये बहुत बुरे अपशकुन हैं।’ कंस को अब स्‍मरण आया। उसने कान बन्‍द करके भीतर होने वाला शब्‍द सुनने का प्रयत्‍न किया किन्‍तु बहुत प्रयत्‍न करके भी प्राण-घोष सुनायी नहीं पड़ा। उसने नासिकाग्र और भ्रू देखना चाहा। इनमें से एक की तनिक सी भी झ...