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Shree Hanuman Chalisa - Vaidik Sagar | श्री हनुमान चालीसा - वैदिक सागर

Shree Hanuman Chalisa - Vaidik Sagar | श्री हनुमान चालीसा - वैदिक सागर इस article में हमने आपसे साझा किया है सम्पूर्ण “श्री हनुमान चालीसा”। इस आर्टिकल के माध्यम से आप “श्री हनुमान चालीसा” का पूरा ऑडियो Mp3 में डाऊनलोड कर पाएंगे फ्री में बीना किशी शुल्क के। इस पोस्ट के साथ हमे “श्री हनुमान चालीसा” का Pdf भी share किया है। इस पोस्ट में “श्री हनुमान चालीसा” की सम्पूर्ण lyrics भी है जो दोहों के साथ है।  Keywords: श्री हनुमान चालीसा, श्री हनुमान चालीसा लिरिक्स, श्री हनुमान चालीसा lyrics, हनुमान चालीसा की लिरिक्स, हनुमान चालीसा की lyrics, Shree Hanuman Chalisa Lyrics, Lyrics of Shree Hanuman Chalisa, Hanuman Chalisa Lyrics, Shree Hanuman Chalisa Ki Lyrics, Shree Hanuman Ji Ki Aarti, Hanuman Aarti, Shree Hanuman Vandana, श्री हनुमान वन्दना, श्री हनुमान आरती, जय जय हनुमान गुसाई, पवन पुत्र हनुमान, पवन पुत्र की आरती, वैदिक सागर, Vaidik Sagar, श्री हनुमान चालीसा Pdf, Pdf of Shree Hanuman Chalisa. Download “श्री हनुमान चालीसा” Pdf Shree Hanuman Chalisa Playlist: 1. Shree Hanuman Vandna |...

घास के तिनके का महत्व - वैदिक सागर

घास के तिनके का महत्व :  रामायण में एक घास के तिनके का भी रहस्य है, जो हर किसी को नहीं मालूम क्योंकि आज तक हमने हमारे ग्रंथो में सिर्फ पढ़ा, समझने की कोशिश नहीं की। रावण ने जब माँ सीता जी का हरण करके लंका ले गया तब लंका मे सीता जी वट वृक्ष के नीचे बैठ कर चिंतन करने लगी। रावण बार बार आकर माँ सीता जी को धमकाता था, लेकिन माँ सीता जी कुछ नहीं बोलती थी।  यहाँ तक की रावण ने श्री राम जी के वेश भूषा मे आकर माँ सीता जी को भ्रमित करने की भी कोशिश की लेकिन फिर भी सफल नहीं हुआ, रावण थक हार कर जब अपने शयन कक्ष मे गया तो मंदोदरी ने उससे कहा आप तो राम का वेश धर कर गये थे, फिर क्या हुआ? रावण बोला- जब मैं राम का रूप लेकर सीता के समक्ष गया तो सीता मुझे नजर ही नहीं आ रही थी। रावण अपनी समस्त ताकत लगा चुका था लेकिन जिस जगत जननी माँ को आज तक कोई नहीं समझ सका, उन्हें रावण भी कैसे समझ पाता ! रावण एक बार फिर आया और बोला मैं तुमसे सीधे सीधे संवाद करता हूँ लेकिन तुम कैसी नारी हो कि मेरे आते ही घास का तिनका उठाकर उसे ही घूर-घूर कर देखने लगती हो, क्या घास का तिनका तुम्हें राम स...

मौन का मूल्य - वैदिक सागर

मौन का मूल्य - वैदिक सागर     गांधी जी ने मौन को सत्य के उपासक के आध्यात्मिक अनुशासन का एक अनिवार्य हिस्सा माना है । मनुष्य की सच्चाई को अतिरंजित करने, संशोधित करने या दबाने की स्वाभाविक कमजोरी है।        लेकिन एक आदमी जो हर शब्द बोलता है, वह कम ही बोलता है। हालांकि, विडंबना यह है कि बहुत से लोग बोलने के लिए उत्सुक हैं परन्तु वे यह नहीं सोचते कि क्या दूसरे सुनना चाहते हैं या नहीं।  वे यह नहीं समझते कि ऐसी स्थिति में उनकी बात बस समय और ऊर्जा का अपव्यय है।        गांधीजी का मानना था कि यदि लोग मौन का गुण जानते हैं तो दुनिया का आधा दुख खत्म हो जाएगा। आधुनिक सभ्यता की शुरुआत से पहले, हम शांति से लगभग सात से आठ घंटे तक बोलने के बिना सो सकते थे। लेकिन आधुनिक सभ्यता ने दिन को  रात में तथा सुनहरे मौन को शोर -शराबे  में परिवर्तित कर दिया है । दिव्य रेडियो हमेशा विवेक के माध्यम से हमसे बात कर रहा है लेकिन हम इसे सुनने के लिए खुद को उपलब्ध नहीं कराते हैं।         इसके विपरीत, हम बिन...

ईमानदारी का फल - प्रेरणादायक कहानियाँ - वैदिक सागर

ईमानदारी का फल: अली एक खान में काम करने वाला मजदूर था जो अपने परिवार के साथ जंगल के निकट एक छोटे से घर में रहता था। एक दिन अली के साथ खान में एक दुर्घटना घटी। चोट के कारण वह काम करनें में असमर्थ हो गया। इससे उसका तथा उसके परिवार का जीवन कठिन हो गया। जब उसके घाव भरने लगे तो वह अपने परिवार के पालन - पोषण का उपाय ढूंढने के लिए जंगल जाने लगा। एक दिन अली जंगल में एक पेड़ के नीचे बैठा हुआ था। अचानक उसने तेजी से दौड़ते घोडों की आवाज सुनी। उसने राजकुमार को घोड़े पर सवार तथा उसके पीछे सैनिकों का एक समूह देखा। वे लोग एक हिरण का पीछा कर रहे थे। जब वे लोग चले गए तब जंगल फिर से शांत हो गया। उसने उस रास्ते पर कुछ गिरा देखा जिस रास्ते से घोड़े गए थे।  उसने वह चीज उठाई तथा देखा कि वह एक बहुत सुंदर चमड़े का बटुआ है। बटुए के ऊपर राजकुमार का नाम सोने से लिखा था। उसने धीरे से बटुआ खोला। उसमें ढेरों स्वर्ण मुद्राए थीं। अली वहीं बैठकर राजकुमार तथा उसके सिपाहियों का इंतजार करने लगा, जिससे वह बटुआ राजकुमार को लौटा दे। धीरे-धीरे अंधेरा हो गया। जब देर रात हो गईं थी परन्तु राजकुमार का कोई पता नह...

कछुए के प्रतीक को घर में रखने के कुछ लाभ - वैदिक सागर

कछुए के प्रतीक को घर में रखने के कुछ लाभ - वैदिक सागर कछुए के प्रतीक को घर में रखने के कुछ लाभ - वैदिक सागर → कछुए के प्रतीक को घर में रखने से आर्थिक उन्नति तथा सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।  → वास्तु और फेंगशुई के अनुसार कछुआ एक प्रभावशाली यंत्र है, जिससे वास्तु दोष का निवारण होकर घर में खुशहाली आती है। → कछुए को शांत तथा मंदगति से चलने वाला दीर्घजीवी प्राणी माना गया है।  → सनातन धर्म के अनुसार कछुए को शुभता का प्रतीक भी माना जाता है। → कछुए के प्रतीक को कभी भी बेडरूम में नहीं रखना चाहिए।  → कछुए का सर्वोत्तम स्थान ड्राइंग रूम माना गया है।  → हमेशा घर के अंदर की ओर कछुए का मुंह रखना सर्वदा फलदायी है।  → कछुए के संबंध में ऐसी मान्यता है कि कछुए के प्रतीक को घर में रखने से निरंतर आर्थिक उन्नति होती है। loading...

आंत्रिक शांति के बिना गरीब होता है मनुष्य - वैदिक सागर

आंत्रिक शांति के बिना गरीब होता है मनुष्य - वैदिक सागर  एक राजा के दरबार में कोई आम ले आया। राजा ने कभी आम नहीं खाया था इसलिए उसने पूछा, "यह क्या है" जो व्यक्ति आम लाया था, उसने कहा, "महाराज ! यह आम है। यह बहुत ही अच्छा फल है, आप इसे खाकर देखिए।" राजा ने कहा, "मुझें नहीं खाना है। मेरे दरबार में जो लोग बैठे हैं इन्हें खिलाओ। ये लोग खाकर मुझे बताएंगे कि ये आम कैसा फल है? "राजा ने अपने प्रधान को आम दिया और उसे खाने के लिए कहा । उसने खाया और कहा, "महाराज यह तो बहुत बढ़िया" है। यह नरम है, मीठा है और इसमें रस भी है। राजा ने कहा, "अब भी मुझे समझ में नहीं आया।" आखिर दरबार में एक अन्य विद्वान सज्जन को आम दिया गया ताकि वह खाकर राजा को उसके चारे में सटीक जानकारी दे सके मगर वह खाने की बजाय आम को काटकर सीधे राजा के पास ले आए और कहा, "राजन इसे आप खाइए। जब तक आप नहीं खाएंगे तब तक दूसरों के खाने से आपको कुछ पता नहीं लगेगा कि यह क्या चीज है। यह व्यक्तिगत अनुभव की बात है। "राजा आम को चखता है और चखने के बाद कहता है, "ह...

मृत्यु के बारे में कुछ दिलचस्प तथ्य - वैदिक सागर

मृत्यु  के बारे में कुछ दिलचस्प तथ्य मरने के उपरांत 47 दिन बाद आत्मा पहुंचती है यमलोक, आइये जाने क्या - क्या होता है रास्ते में मृत्यु एक ऐसा सच है जिसे कोई भी झुठला नहीं सकता। हिंदू धर्म में मृत्यु के बाद स्वर्ग-नरक की मान्यता है। पुराणों के अनुसार जो मनुष्य अच्छे कर्म करता है, वह स्वर्ग जाता है,जबकि जो मनुष्य जीवन भर बुरे कामों में लगा रहता है, उसे यमदूत नरक में ले जाते हैं। सबसे पहले जीवात्मा को यमलोक लेजाया जाता है। वहां यमराज उसके पापों के अनुसार उसे सजा देते हैं। मृत्यु के बाद जीव - आत्मा यमलोक तक किस प्रकार जाती है, इसका विस्तृत वर्णन गरुड़ पुराण में है। गरुड़ पुराण में यह भी बताया गया है कि किस प्रकार मनुष्य के प्राण निकलते हैं और किस प्रकार प्रेत का रूप लेता है। गरुड़ पुराण के अनुसार जिस मनुष्य की मृत्यु होने वाली होती है, वह बोल नहीं पाता है। अंत समय में उसमें दिव्य दृष्टि उत्पन्न होती है और वह संपूर्ण संसार को एकरूप समझने लगता है। उसकी सभी इंद्रियां नष्ट हो जाती हैं। वह जड़ अवस्था में आ जाता है, यानी हिलने-डुलने में असमर्थ हो जाता है। इसके बाद उस...

पुरुष का श्रृंगार तो स्वयं प्रकृति ने किया है..

पुरुष का श्रृंगार तो स्वयं प्रकृति ने किया है.. स्त्रियाँ काँच का टुकड़ा हैं..जो मेकअप की रौशनी पड़ने पर ही चमकती हैं.. किन्तु पुरुष हीरा है जो अँधेरे में भी चमकता है और उसे मेकअप की कोई आवश्यकता नहीं होती। खूबसूरत मोर होता है मोरनी नहीं.. मोर रंग - बिरंगा और हरे - नीले रंग से सुशोभित..जबकि मोरनी काली सफ़ेद.. मोर के पंख होते हैं इसीलिए उन्हें मोरपंख कहते हैं..मोरनी के पंख नहीं होते.. दांत हाथी के होते हैं,हथिनी के नहीं। हांथी के दांत बेशकीमती होते हैं। नर हाथी मादा हाथी के मुकाबले बहुत खूबसूरत होता है। कस्तूरी नर हिरन में पायी जाती है। मादा हिरन में नहीं। नर हिरन मादा हिरन के मुकाबले बहुत सुन्दर होता है। मणि नाग के पास होती है ,नागिन के पास नहीं। नागिन ऐसे नागों की दीवानी होती है जिनके पास मणि होती है। रत्न महासागर में पाये जाते हैं, नदियो में नहीं..और अंत में नदियों को उसी महासागर में गिरना पड़ता है। संसार के बेशकीमती तत्व इस प्रकृति ने पुरुषों को सौंपे.. प्रकृति ने पुरुष के साथ अन्याय नहीं किया.. 9 महीने स्त्री के गर्भ में रहने के बावजूद भी औलाद का चेहर...

भगवान को ये लोग हैं सबसे प्यारे - हिंदी प्रेरणादायक कहानी - वैदिक सागर

भगवान को ये लोग हैं सबसे प्यारे, जानें क्या आप हैं उन में शामिल एक राजा बहुत बड़ा प्रजापालक था, हमेशा प्रजा के हित में प्रयत्नशील रहता था। वह इतना कर्मठ था कि अपना सुख, ऐशो-आराम सब छोड़कर सारा समय जन-कल्याण में लगा देता था। यहां तक कि जो मोक्ष का साधन है अर्थात भगवद्-भजन, उसके लिए भी वह समय नहीं निकाल पाता था। एक सुबह राजा वन की तरफ भ्रमण करने के लिए जा रहा था कि उसे एक देव के दर्शन हुए। राजा ने देव को प्रणाम करते हुए उनका अभिनन्दन किया और देव के हाथों में एक लम्बी-चौड़ी पुस्तक देखकर उनसे पूछा,‘‘महाराज, आपके हाथ में यह क्या है?’’ देव बोले,‘‘राजन! यह हमारा बहीखाता है, जिसमें सभी भजन करने वालों के नाम हैं।’’ राजा ने निराशायुक्त भाव से कहा,‘‘कृपया देखिए तो इस पुस्तक में कहीं मेरा नाम भी है या नहीं?’’ देव महाराज किताब का एक-एक पृष्ठ उलटने लगे, परन्तु राजा का नाम कहीं भी नजर नहीं आया। राजा ने देव को चिंतित देखकर कहा,‘‘महाराज ! आप चिंतित न हों, आपके ढूंढने में कोई भी कमी नहीं है। वास्तव में यह मेरा दुर्भाग्य है कि मैं भजन-कीर्तन के लिए समय नहीं निकाल पाता, और इसीलिए मेरा नाम...

मनुष्य का मन एक हाथी जैसा - वैदिक सागर

मनुष्य का मन एक हाथी जैसा - भगवान् को बार-बार याद करो एक हाथी है उसे नहला धुला कर छोड़ दो तब फिर वह क्या करेगा ? मिट्टी में खेलेगा और अपने शरीर को फिर गन्दा कर लेगा, कोई उस पर बैठे तो उसका शरीर भी गन्दा अवश्य होगा । लेकिन यदि हाथी को स्नान कराने के बाद पक्के बाड़े में बाँध दिया जाये ?-तब फिर हाथी अपना शरीर गन्दा नहीं कर सकेगा । मनुष्य का मन भी हाथी के समान है एक बार ध्यान साधन और भगवान् के भजन से वह शुद्ध हो गया तो उसे स्वतन्त्र नहीं कर देना चाहिये । इस संसार में पवित्रता भी है, मन का स्वभाव है वह गन्दगी में जायेगा और मनुष्य देह को दूषित करने से नहीं चूकेगा इसलिये उसे गन्दगी से बचाये रखने के लिये एक बाड़े की जरूरत होती है जिसमें वह घिरा रहे । गन्दगी की सम्भावनाओं वाले स्थानों में न जा सके । ईश्वर का भजन उसका निरन्तर ध्यान एक बाड़ा है जिसमें मन को बन्द रखा जाना चाहिये, तभी साँसारिक संसर्ग से उत्पन्न दोष और मलिनता से बचाव सम्भव है। भगवान् को बार-बार याद करते रहोगे तो मन अस्थायी सुखों के आकर्षण और पाप से बचा रहेगा और अपने जीवन के स्थायी लक्ष्य की याद बनी रहेगी । उस समय दूषित...

हिंदू परंपराओं के पीछे छुपा हुआ है ये विज्ञान - वैदिक सागर

हिंदू परंपराओं के पीछे छुपा हुआ है ये विज्ञान! हिंदू संस्कृति किसी अंधविश्वास पर नहीं बल्कि विज्ञान की ठोस धरातल पर बनी है, जिस पर लाखों लोग विश्वास करते हैं और आगे भी करते रहेंगे। इस संस्कृति में सांस लेने, खाने, बैठने और खड़े होने जैसी सामान्य बातों समेत जीवन का हर पहलू एक आध्यात्मिक प्रक्रिया के तौर पर विकसित हुआ। इंसान की परम प्रकृति को यहां बड़े व्यापक तरीके से खोजा गया है। हालांकि दुर्भाग्य की बात यह है कि हमारी संस्कृति से संबंधित काफी कुछ खो चुका है। वास्तव में हम उसे सुरक्षित ही नहीं रख पाए, लेकिन फिर भी यह एक जीती जागती संस्कृति है। इसी संस्कृति कि उन परंपराओं को जानेगें और उनके पीछे के वैज्ञानिक कारणों को जिसे आम लोग नहीं जानते हैं, आज उस पर से पर्दा उठाएंगे। जरुर पढे़ यह लेख... 1. नदी में सिक्के फेंकना : हम लोग यह हमेशा से ही सुनते आ रहें हैं, कि बहती नदी में सिक्के डालने से हमे सौभाग्य प्राप्त होगा। लेकिन इसका एक वैज्ञानिक कारण है, पहले जब सिक्के बनाये जाते थे तो वे तांबे के होते थे जो कि हमारे शरीर के लिए एक बहुत उपयोगी धातु मनी जाती है। लेकिन आज के समय में यह...

अर्जुन के वृक्ष से लाभ - हेल्थ टिप्स - वैदिक सागर

अर्जुन के वृक्ष से लाभ... - अर्जुन छाल को दूध् में पीसकर मधु मिलाकर सेवन करने से रक्तातिसार मिटता है। - अर्जुन छाल एवं गंगेरण समभाग लेकर व आधा भाग एरण्ड बीज चूर्ण प्रतिदिन प्रातः सांयकाल बकरी के दूध् में डालकर ;लगभग ५ ग्राम चूर्णद्ध पकायें। ठण्डा होने पर विषम मात्राा ;१-३ या ३-१द्ध में घृत मध्ु मिलाकर पिलाने से क्षय रोग मिटता है। - त्वक चूर्ण, अर्जुनत्वक चूर्ण एवं चावलों का चूर्ण सेवन करने से कुष्ठ में लाभ होता है व समस्त प्रकार के त्वचागत रोग मिटते है। - भृंगराज एवं अर्जुनक्षार दही के पानी के साथ सेवन करने से संग्रहणी में लाभ होता है। - उडद के आटे में अर्जुन छाल चूर्ण मिलाकर घृत में सेंक कर भैंस के दूध् में पकाकर सेवन करने से भस्मक तीक्ष्णाग्निद्ध मिटती है। - २ ग्राम अर्जुन त्वक चूर्ण, २ ग्राम कडुवा इन्द्र जौ चूर्ण मिलाकर शीतल जल से सेवन करने से तीव्र अतिसार मिटता है। - अर्जुन छाल ३ ग्राम, गुलाब जल १५ मिली, द्राक्षरिष्ट या मृ(कासव १५ मिली की मात्रा से प्रतिदिन भोजन के पश्चात यदि गर्भवती स्त्राी सेवन करें तो उसे बहुत सुंदर सन्तान की प्राप्ति होती है, ऐसा स्वयं...

मेरा नटखट नन्हा कान्हा - ३ - वैदिक सागर

मेरा नटखट नन्हा कान्हा  फाल्‍गुन कृष्‍ण त्रयोदशी तिथि थी। सायंकाल चतुर्दशी हो जाने से महाशिवरात्रि का दिन था। अरुणोदय प्रारम्‍भ ही हुआ था कि कंस ने दूत भेजकर पीठ, पैदिक, असिलोम आदि मन्‍त्रियों को बुलवाया। उसने आज्ञा देनी प्रारम्‍भ की– ‘रंगशाला को फिर से सजा दिया जाय। माल्‍य, किसलय-तोरणादि शीघ्र लगाये जायें। सुगन्‍धित धूप जलायी जाये वहाँ चारों ओर। मल्‍लक्रीड़ा महोत्‍सव की घोषणा करो। राजकीय वाद्य-वादकगण अविलम्‍ब वहाँ वादन प्रारम्‍भ करें। थोड़े ही क्षणों में रंगशाला से सुमधुर वाद्यों की ध्‍वनि आने लगी। धनुष टूट चुका था, सत्‍यक जी नगर में नहीं थे। अत: धनुर्यज्ञ अथवा माहेश्वर महामख की चर्चा व्‍यर्थ थी। कंस ने नगर में मल्‍लक्रीड़ा महोत्‍सव की घोषणा करवा दी प्रात:काल। ‘देवकी-वसुदेव को तथा उग्रसेन को भी कारागार से ले आओ।’ कंस ने आदेश दिया– ‘ये सुरक्षित मंचों पर पृथक-पृथक बैठाये जावेंगे। नगर में घोषणा करो कि समस्‍त नागरिकों को महाराज मल्‍लक्रीड़ा देखने को आमन्‍त्रित करते हैं। सबको अवश्‍य आना चाहिये। कोई गृहों में न रहे। भवनों की नगर की रक्षाकी व्‍यवस्‍था की गयी है। यह कार्य राजपुरु...

मेरा नटखट नन्हा कान्हा - 2- वैदिक सागर

मेरा नटखट नन्हा कान्हा  ‘धनुष टूट गया'  इस समाचार ने सबसे बड़ा धक्‍का दिया और उस पर जो सेना भेजी गयी, सेनापति सहित वह पूरी सेना दो बालकों ने मार दी। एक भी कोई उनमें से संहार का समाचार देने कंस तक नहीं लौटा। सत्‍यक भी भीरु ही निकला। अन्‍तत: है तो वह भी ब्राह्मण ही। कंस मुट्ठियां बांधकर इधर-से-उधर कक्ष में घूमने लगा। अन्धकार हो चला। कक्ष में सेवक ने प्रदीप जला दिये। कंस सहसा चौंका– ‘उसकी छाया में ये इतने छिद्र छाया के तो मस्‍तक ही नहीं है।’ घबराकर सिर टटोला उसने– ‘सिर तो अपने स्‍थान पर ही है।’ बाहर आ गया कक्ष से वह किन्‍तु आज उसके नेत्रों को क्‍या हो गया है? उसे सब तारे दो-दो दीखते हैं। वृक्षों के पत्ते ऐसे स्‍वर्णिम लगते हैं, जैसे वृक्षों में आग लगी हो। वह फिर कक्ष में आया और फिर चौंका– ‘उसकी छाया पर दो सिर कैसे?’ फिर अपना सिर टटोला उसने। ‘ये बहुत बुरे अपशकुन हैं।’ कंस को अब स्‍मरण आया। उसने कान बन्‍द करके भीतर होने वाला शब्‍द सुनने का प्रयत्‍न किया किन्‍तु बहुत प्रयत्‍न करके भी प्राण-घोष सुनायी नहीं पड़ा। उसने नासिकाग्र और भ्रू देखना चाहा। इनमें से एक की तनिक सी भी झ...

गिलोय बेल जो 70 रोगों को जड़ से मिटाती है - हेल्थ टिप्स - वैदिक सागर

ये गिलोय एक प्रकार की बेल  है जो 70 रोगों को जड़ से मिटाती है, ये आसानी से गाँव मे मिल जाती है । गिलोय एक प्रकार की लता/बेल है, जिसके पत्ते पान के पत्ते की तरह होते है। यह इतनी अधिक गुणकारी होती है, कि इसका नाम अमृता रखा गया है। आयुर्वेद में गिलोय को बुखार की एक महान औषधि के रूप में माना गया है। गिलोय का रस पीने से शरीर में पाए जाने वाली विभिन्न प्रकार की बीमारियाँ दूर होने लगती हैं। गिलोय की पत्तियों में कैल्शियम, प्रोटीन तथा फास्फोरस पाए जाते है। यह वात, कफ और पित्त नाशक होती है। यह हमारे शरीर की रोगप्रतिरोधक शक्ति को बढाने में सहायता करती है। इसमें विभिन्न प्रकार के महत्वपूर्ण एंटीबायोटिक तथा एंटीवायरल तत्व पाए जाते है जिनसे शारीरिक स्वास्थ्य को लाभ पहुँचता है। यह गरीब के घर की डॉक्टर है क्योंकि यह गाँवो में सहजता से मिल जाती है। गिलोय में प्राकृतिक रूप से शरीर के दोषों को संतुलित करने की क्षमता पाई जाती है। गिलोय एक बहुत ही महत्वपूर्ण आयुर्वेदिक जडीबूटी है। गिलोय बहुत शीघ्रता से फलने फूलनेवाली बेल होती है। गिलोय की टहनियों को भी औषधि के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। गिल...