तेषां के योगवित्तमा:
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अर्जुन उवाच–
एवं सततयुक्ता ये भक्तास्त्वां पर्युपासते ।
ये चाप्यक्षरमव्यक्तं तेषां के योगवित्तमा: ।।
–श्रीमद्भगवद्गीता 12/1
"अर्जुन बोले– इस प्रकार निरन्तर प्रयत्न में लगे हुए जो भक्त आपकी भली-भाँति उपासना करते हैं और जो अव्यक्त अक्षर की उपासना करते हैं, उनमें उत्तम योगवेत्ता कौन हैं?"
टिप्पणी
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सततयुक्ताः –
एवं सततयुक्ताः? नैरन्तर्येण भगवत्कर्मादौ यथोक्ते अर्थे समाहिताः सन्तः प्रवृत्ता इत्यर्थः।
अव्यक्तम् –
ये भक्ताः अनन्यशरणाःसन्तः त्वां
यथादर्शितं विश्वरूपं पर्युपासते ध्यायन्ति ये चान्येऽपि त्यक्तसर्वैषणाः संन्यस्तसर्वकर्माणः
यथाविशेषितं ब्रह्म अक्षरं
निरस्तसर्वोपाधित्वात्
अव्यक्तम् अकरणगोचरम्।
व्यक्तम् –
यत् हि करणगोचरं तत् व्यक्तम् उच्यते।
श्रीरामानुजगीताभाष्यम्
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एवं ‘मत्कर्मकृत्’ (गीता,11/55) इत्यादिना उक्तेन प्रकारेण सततयुक्ताः भगवन्तं त्वाम् एव
परं प्राप्यं मन्वाना ये भक्ताः त्वां सकलविभूतियुक्तम् अनवधिकातिशय
सौन्दर्यसौशील्यसार्वज्ञसत्य संकल्पत्वाद्यनन्तगुणसागरं परिपूर्णम् उपासते, ये च अपि अक्षरं प्रत्यगात्म
स्वरूपं तद् एव च अव्यक्तं चक्षुरादि करणेन अनभिव्यक्तस्वरूपम् उपासते, तेषाम् उभयेषां के योगवित्तमाः के स्वसाध्यं प्रति शीघ्रगामिनः इत्यर्थः। ‘भवामि न चिरात्पार्थ मय्यावेशितचेत साम्।।’ (गीता,12/7)
इति उत्तरत्र योगवित्तमत्वं शैघ्य्रविषयम् इति हि व्यञ्जयिष्यते।
भाष्य का हिन्दी भाव
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अर्जुन भगवान् से कहते हैं – इस प्रकार ‘मत्कर्मकृत्’ आदि श्लोक द्वारा बतलाये हुए प्रकार से निरन्तर प्रयत्न करनेवाले जो भक्त आप भगवान् को ही परम प्राप्य मानकर समस्त विभूतियों से युक्त, अपार अतिशय सौन्दर्य, सौशील्य, सर्वज्ञत्व, सत्यसंकल्पत्व आदि अनन्त गुणों के समुद्र आप परमेश्वर की परिपूर्ण उपासना करते हैं तथा जो चक्षु आदि इन्द्रियों के द्वारा अभिव्यक्त न होने वाले अवयक्त अक्षर प्रत्यगात्मस्वरूप की उपासना करते हैं? अभिप्राय यह है कि अपने साध्य के समीप शीघ्रता से कौन पहुँच सकते हैं? क्योंकि ‘भवामि नचिरात्पार्थ मय्यावेशितचेतसाम्।’ यह कहकर आगे इस बात को स्पष्ट करते हैं कि यहाँ- योगवेत्तापन शीघ्रता विषयक है।
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अर्जुन उवाच–
एवं सततयुक्ता ये भक्तास्त्वां पर्युपासते ।
ये चाप्यक्षरमव्यक्तं तेषां के योगवित्तमा: ।।
–श्रीमद्भगवद्गीता 12/1
"अर्जुन बोले– इस प्रकार निरन्तर प्रयत्न में लगे हुए जो भक्त आपकी भली-भाँति उपासना करते हैं और जो अव्यक्त अक्षर की उपासना करते हैं, उनमें उत्तम योगवेत्ता कौन हैं?"
टिप्पणी
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सततयुक्ताः –
एवं सततयुक्ताः? नैरन्तर्येण भगवत्कर्मादौ यथोक्ते अर्थे समाहिताः सन्तः प्रवृत्ता इत्यर्थः।
अव्यक्तम् –
ये भक्ताः अनन्यशरणाःसन्तः त्वां
यथादर्शितं विश्वरूपं पर्युपासते ध्यायन्ति ये चान्येऽपि त्यक्तसर्वैषणाः संन्यस्तसर्वकर्माणः
यथाविशेषितं ब्रह्म अक्षरं
निरस्तसर्वोपाधित्वात्
अव्यक्तम् अकरणगोचरम्।
व्यक्तम् –
यत् हि करणगोचरं तत् व्यक्तम् उच्यते।
श्रीरामानुजगीताभाष्यम्
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एवं ‘मत्कर्मकृत्’ (गीता,11/55) इत्यादिना उक्तेन प्रकारेण सततयुक्ताः भगवन्तं त्वाम् एव
परं प्राप्यं मन्वाना ये भक्ताः त्वां सकलविभूतियुक्तम् अनवधिकातिशय
सौन्दर्यसौशील्यसार्वज्ञसत्य संकल्पत्वाद्यनन्तगुणसागरं परिपूर्णम् उपासते, ये च अपि अक्षरं प्रत्यगात्म
स्वरूपं तद् एव च अव्यक्तं चक्षुरादि करणेन अनभिव्यक्तस्वरूपम् उपासते, तेषाम् उभयेषां के योगवित्तमाः के स्वसाध्यं प्रति शीघ्रगामिनः इत्यर्थः। ‘भवामि न चिरात्पार्थ मय्यावेशितचेत साम्।।’ (गीता,12/7)
इति उत्तरत्र योगवित्तमत्वं शैघ्य्रविषयम् इति हि व्यञ्जयिष्यते।
भाष्य का हिन्दी भाव
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अर्जुन भगवान् से कहते हैं – इस प्रकार ‘मत्कर्मकृत्’ आदि श्लोक द्वारा बतलाये हुए प्रकार से निरन्तर प्रयत्न करनेवाले जो भक्त आप भगवान् को ही परम प्राप्य मानकर समस्त विभूतियों से युक्त, अपार अतिशय सौन्दर्य, सौशील्य, सर्वज्ञत्व, सत्यसंकल्पत्व आदि अनन्त गुणों के समुद्र आप परमेश्वर की परिपूर्ण उपासना करते हैं तथा जो चक्षु आदि इन्द्रियों के द्वारा अभिव्यक्त न होने वाले अवयक्त अक्षर प्रत्यगात्मस्वरूप की उपासना करते हैं? अभिप्राय यह है कि अपने साध्य के समीप शीघ्रता से कौन पहुँच सकते हैं? क्योंकि ‘भवामि नचिरात्पार्थ मय्यावेशितचेतसाम्।’ यह कहकर आगे इस बात को स्पष्ट करते हैं कि यहाँ- योगवेत्तापन शीघ्रता विषयक है।

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