गायत्री मंत्र अध्यात्मिक रहस्य ॐ भूर्भुवः स्वःतत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्यः धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात् यह मंत्र सूर्य देवता के लिए नही बल्कि उस अखण्ड प्रकाश स्वरूप के लिये प्रार्थना की गई है जो हम सबके भीतर है जिनके बारे में भगवान श्रीकृष्ण गीता के 13 अध्याय के 17 वां श्लोक में कहते है (वह् परमात्मा ज्योतियों का भी ज्योति है जो हम सबके भीतर है जिसे ज्ञान के द्वारा हम अपने भीतर जान सकते है देख सकते है।) ॐ = परमात्मा (आकर, मकार ओर उकार) भूर = मनुष्य को प्राण प्रदाण करने वाले भुवः = दुख़ों का नाश करने वाले स्वः = सुख़ प्रदान करने वाले तत = वह, सवितुर = प्रकाशक प्रेरक वरेण्यं = वरन् योग्य भर्गो = ज्योतियों का भी परम् ज्योति स्वरूप देवस्य = प्रभू धीमहि = (ध्यान करना) धियो = बुद्धि, यो = जो, नः = हमारी, प्रचोदयात् = हमें शक्तिदे हम उस परमात्मा का जो प्राणों से भी प्यार दुख विनाशक स्वरूप है जो प्रकाश रूप में विद्यमान है। उस प्रकाश का दर्शन करके उस ज्योति का जब ध्यान करके अपने इन्द्रयों को वश में करेंगे तभी बुद्धि अच्छे मार्ग...
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