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गायत्री मंत्र अध्यात्मिक रहस्य - वैदिक सागर

गायत्री मंत्र अध्यात्मिक रहस्य

ॐ भूर्भुवः स्वःतत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्यः धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्

 यह मंत्र सूर्य देवता के लिए नही बल्कि उस अखण्ड प्रकाश स्वरूप के लिये प्रार्थना की गई है जो हम सबके भीतर है जिनके बारे में भगवान श्रीकृष्ण गीता के 13 अध्याय के 17 वां श्लोक में कहते है (वह् परमात्मा ज्योतियों का भी ज्योति है जो हम सबके भीतर है जिसे ज्ञान के द्वारा हम अपने भीतर जान सकते है देख सकते है।)


ॐ = परमात्मा (आकर, मकार ओर उकार)
भूर = मनुष्य को प्राण प्रदाण करने वाले
भुवः = दुख़ों का नाश करने वाले
स्वः = सुख़ प्रदान करने वाले
तत = वह,
सवितुर = प्रकाशक प्रेरक
वरेण्यं = वरन् योग्य
भर्गो = ज्योतियों का भी परम् ज्योति स्वरूप
देवस्य = प्रभू
धीमहि =(ध्यान करना)
धियो = बुद्धि,
यो = जो,
नः = हमारी,
प्रचोदयात् = हमें शक्तिदे

    हम उस परमात्मा का जो प्राणों से भी प्यार दुख विनाशक स्वरूप है जो  प्रकाश रूप में विद्यमान है। उस प्रकाश का दर्शन करके उस ज्योति का जब ध्यान करके अपने इन्द्रयों को वश में करेंगे तभी बुद्धि अच्छे मार्ग पर अग्रसर हो पाएगी।
      वो प्रकाश हमसबके भीतर है। जो हमारे प्राणों में विद्यामान है जिस दिन वो हमारे प्राणों से निकल जाएगी उस दिन यह शरीर लाश के सिवाय कुछ नही। ओर उसी प्रकाश रूप के बारे में हमारे वेदों में कहा गया है उसी प्रकाश को हम सब भगवान शिव की स्तुति कहते है-- कर्पूर गौरं करुणावतारम(वो परमात्मा कपूर की तरह सफेद है जो हम सबके ह्रदय में निवास करते है।)
    यही बात भगवान शिव मातापार्वती को कहते है 176 श्लोक में गुरुगीता के स्कन्दपुराण में जो अखण्ड प्रकाश रूप का हमारे भीतर दर्शन कर दे वो ही गुरु पुर्नसद्गुरु होते है।
      गायत्री मंत्र केवल रटने के लिए नही है न ही सूर्य देवता के बारे में कहा गया है बल्कि वो मन्त्र हमें मार्ग दिखा रही है की हम अपने भीतर ईश्वर के प्रकाश स्वरूप का दर्शन कर ध्यान करे तभी हम अपने लक्ष्य को प्राप्त कर पाएंगे।
    ओर परमात्मा के प्रकाश स्वरूप का दर्शन कोई पुर्नसद्गुरु ही करा सकते है। इसलिए केवल पढ़ने या रटने तक सीमित न रहे ओर जो गायत्री मंत्र है वो वेद से लिया गया है जो दिव्य दृष्टि के द्वारा देखकर लिखा गया है न कि बाहरी दो नेत्रों से। दिव्य दृष्टि वाले ग्रन्थ को बाहरी नेत्रों से पढ़कर समझने का प्रयास करेंगे तो अर्थ का अनर्थ कर देंगे।
   इसलिए पुर्नसद्गुरु के द्वारा दिव्य दृष्टि प्राप्त कर अपने भीतर उस अखण्ड परमात्मा का दर्शन करें तभी सत्यता प्रकट होगी

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