Skip to main content

हरी धनियां के पत्तों के लाभ - वैदिक सागर


हरी धनियां के पत्तों के लाभ - वैदिक सागर

भोजन को स्वादिष्ट बनाने के लिए, हमें उन खाद्य पदार्थों को लेना चाहिए जो हमारे स्वाद को बढाते हैँ और हमारे स्वास्थ्य को बेहतर बनाते हैँ। इसी तरह, धनियां का उपयोग भोजन को स्वादिष्ट बनाने के लिए किया जाता है। यह स्वाद के साथ भोजन का रं भी बदलता है। धनियां की पत्तियों में कईं पोष्टिक तत्व होते हैँ जो हमारे शरीर को स्वस्थ रखने में मदद करतै हैँ। धनियां पत्ती में विटामिन, खनिज और अमीनो एसिड हौले हैं जो शरीर को स्वास्थ्य संबंधी समस्याओँ से बचाने मेँ मदद करते हैं।

हरी धनियां के पत्तों के लाभ - वैदिक सागर

धनिया में विटामिन A, विटामिन C फास्फोरस जेसे कई एंटींआक्सिडेंट होते हैँ जो दृष्टि हानि को रोकते हैं। इसके साथ ही धनिया आंखो पर पडने वाले खिंचाव को कम करने में मदद करता है।

धनिया के पत्तों का सेवन डायरिया, एनीमिया जैसी समस्याओँ से राहत दिलाने में भी सहायक है। धनिया में विटामिन सी, विटामिन के, प्रोटीन, कैल्पिग्यम, याइमिन कैरोटिन और पोटैशियम भी होता है जो शरीर को स्वस्थ रखने में मदद करता है।

धनिया के पत्तों का सेवन डायरिया, एनीमिया जैसी समस्याओ सै राहत दिलाने में भी सहायक है । धनिया में विटामिन सी, विटामिन के, प्रोटीन, क्रैल्पिगयम, थाइमिन केरोटिन ओर पोटैशियम भी होता है जो शरीर को स्वस्थ रखने में मदद करता है । तो चलिए हम आपको धनिया के सेवन से होने चालै स्वास्थ्य लाभों के बारे में बताते हैं । धनिया में लिनोलिक एसिड, ओलिक एसिड, यामिटिक एसिड, स्टीयरिक एसिड और एस्कार्बिक्त एसिड होते हैँ, जो रक्त में कोलेस्ट्ररोल के स्तर को कम करने में मदद करते हैँ । इसके अलावा, ये खराब कोलेस्ट्रोल LDL को जमने से रोकने में मददगार होते हैँ।

धनिया में एंटीसैप्टिक, एंटींफंगल और एंटींआँक्सीडेंट होते हैँ जी त्वचा से विषाक्त पदार्थों को बाहर निकालने में मदद करते है। धनिया आपको फंगल संक्रमण और शुष्क त्वचा से बचाने में भी मदद करता है।

Comments

Popular posts from this blog

समुंदर मंथन के दौरान प्राप्त चौदह रत्न - वैदिक सागर

समुंदर मंथन के दौरान प्राप्त चौदह रत्न - वैदिक सागर  1. कालकूट विष समुद्र मंथन में से सबसे पहले कालकूट विष निकला, जिसे भगवान शिव ने ग्रहण कर लिया। इससे तात्पर्य है कि अमृत (परमात्मा) हर इंसान के मन में स्थित है। अगर हमें अमृत की इच्छा है तो सबसे पहले हमें अपने मन को मथना पड़ेगा। जब हम अपने मन को मथेंगे तो सबसे पहले बुरे विचार ही बाहर निकलेंगे। यही बुरे विचार विष है। हमें इन बुरे विचारों को परमात्मा को समर्पित कर देना चाहिए और इनसे मुक्त हो जाना चाहिए। 2. कामधेनु समुद्र मंथन में दूसरे क्रम में निकली कामधेनु। वह अग्निहोत्र (यज्ञ) की सामग्री उत्पन्न करने वाली थी। इसलिए ब्रह्मवादी ऋषियों ने उसे ग्रहण कर लिया। कामधेनु प्रतीक है मन की निर्मलता की। क्योंकि विष निकल जाने के बाद मन निर्मल हो जाता है। ऐसी स्थिति में ईश्वर तक पहुंचना और भी आसान हो जाता है। 3. उच्चैश्रवा घोड़ा समुद्र मंथन के दौरान तीसरे नंबर पर उच्चैश्रवा घोड़ा निकला। इसका रंग सफेद था। इसे असुरों के राजा बलि ने अपने पास रख लिया। लाइफ मैनेजमेंट की दृष्टि से देखें तो उच्चैश्रवा घोड़ा मन की गति का प्रतीक है। मन की ग...

गिलोय बेल जो 70 रोगों को जड़ से मिटाती है - हेल्थ टिप्स - वैदिक सागर

ये गिलोय एक प्रकार की बेल  है जो 70 रोगों को जड़ से मिटाती है, ये आसानी से गाँव मे मिल जाती है । गिलोय एक प्रकार की लता/बेल है, जिसके पत्ते पान के पत्ते की तरह होते है। यह इतनी अधिक गुणकारी होती है, कि इसका नाम अमृता रखा गया है। आयुर्वेद में गिलोय को बुखार की एक महान औषधि के रूप में माना गया है। गिलोय का रस पीने से शरीर में पाए जाने वाली विभिन्न प्रकार की बीमारियाँ दूर होने लगती हैं। गिलोय की पत्तियों में कैल्शियम, प्रोटीन तथा फास्फोरस पाए जाते है। यह वात, कफ और पित्त नाशक होती है। यह हमारे शरीर की रोगप्रतिरोधक शक्ति को बढाने में सहायता करती है। इसमें विभिन्न प्रकार के महत्वपूर्ण एंटीबायोटिक तथा एंटीवायरल तत्व पाए जाते है जिनसे शारीरिक स्वास्थ्य को लाभ पहुँचता है। यह गरीब के घर की डॉक्टर है क्योंकि यह गाँवो में सहजता से मिल जाती है। गिलोय में प्राकृतिक रूप से शरीर के दोषों को संतुलित करने की क्षमता पाई जाती है। गिलोय एक बहुत ही महत्वपूर्ण आयुर्वेदिक जडीबूटी है। गिलोय बहुत शीघ्रता से फलने फूलनेवाली बेल होती है। गिलोय की टहनियों को भी औषधि के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। गिल...

मेरा नटखट नन्हा कान्हा - 2- वैदिक सागर

मेरा नटखट नन्हा कान्हा  ‘धनुष टूट गया'  इस समाचार ने सबसे बड़ा धक्‍का दिया और उस पर जो सेना भेजी गयी, सेनापति सहित वह पूरी सेना दो बालकों ने मार दी। एक भी कोई उनमें से संहार का समाचार देने कंस तक नहीं लौटा। सत्‍यक भी भीरु ही निकला। अन्‍तत: है तो वह भी ब्राह्मण ही। कंस मुट्ठियां बांधकर इधर-से-उधर कक्ष में घूमने लगा। अन्धकार हो चला। कक्ष में सेवक ने प्रदीप जला दिये। कंस सहसा चौंका– ‘उसकी छाया में ये इतने छिद्र छाया के तो मस्‍तक ही नहीं है।’ घबराकर सिर टटोला उसने– ‘सिर तो अपने स्‍थान पर ही है।’ बाहर आ गया कक्ष से वह किन्‍तु आज उसके नेत्रों को क्‍या हो गया है? उसे सब तारे दो-दो दीखते हैं। वृक्षों के पत्ते ऐसे स्‍वर्णिम लगते हैं, जैसे वृक्षों में आग लगी हो। वह फिर कक्ष में आया और फिर चौंका– ‘उसकी छाया पर दो सिर कैसे?’ फिर अपना सिर टटोला उसने। ‘ये बहुत बुरे अपशकुन हैं।’ कंस को अब स्‍मरण आया। उसने कान बन्‍द करके भीतर होने वाला शब्‍द सुनने का प्रयत्‍न किया किन्‍तु बहुत प्रयत्‍न करके भी प्राण-घोष सुनायी नहीं पड़ा। उसने नासिकाग्र और भ्रू देखना चाहा। इनमें से एक की तनिक सी भी झ...